जबलपुर के निषादवंशी जलवंशी मांझी मछुआ समाज का इतिहास क्या है

जबलपुर का इतिहास जलवंशी माझी समाज के बिना अधूरा है यह समाज सदियों से न केवल नर्मदा नदी के संरक्षक के रूप में जाना जाता है बल्कि इस क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक संरचना में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
प्राचीन और पौराणिक चले- जबलपुर का मांझी समाज निषाद केवट , मल्लाह ,ढीमर, सिंगरहा, आदि भी कहा जाता है यह समाज अपनी उत्पत्ति भगवान गुहराज निषाद और महर्षि कश्यप से मानता है। रामायण और महाभारत जैसी ग्रंथों में जल जंगल और जमीन के रक्षक और कुशल नाविको के रूप में मिलता है। जबलपुर में नर्मदा नदी भेड़ाघाट ग्वारीघाट और तिलवाराघाट के किनारे इस समाज की बस्तियां ऐतिहासिक रूप से बसी हुई है प्राचीन समय में इनका मुख्य व्यवसाय नाव चलाना मछली पकड़ना और सिंघाड़ों की खेती करना था ब्रिटिश शासन के दौरान नर्मदा नदी पर परिवहन के लिए माझी समाज की कौशल प्रतिभा का उपयोग किया जाता था।
गंगा से नर्मदा तक का सफर-ऐतिहासिक शोधनों के अनुसार जलवंशी मांझी समाज की पूर्वज मूल रूप से गंगा नदी के तटो बनारस प्रयागराज और इलाहाबाद के निवासी थे सदियों पहले है समाज जलमार्गों के माध्यम से प्रवास करते हुए मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों विशेषकर जबलपुर में आकर बस गया मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी प्रमुख नदी है नर्मदा नदी के प्रचुर जल और मछली पालन की संभावनाओं ने इन्हें यहां स्थाई रूप से बचने के लिए प्रेरित किया जबलपुर और उसके आसपास नर्मदा के तटों पर इनके पीछे बसने का मुख्य कारण नर्मदा का गहरा और शांत जल था जोड़ों और मत्स्य पालन के लिए सर्वोत्तम था इतिहासकार रमाशंकर सिंह की पुस्तक “नदी पुत्र” और विभिन्न शोधों के आधार पर निषाद मांझी समाज का मूल केंद्र मध्य गंगा मैदान रहा है डॉक्टर संजय निषाद के अनुसार श्रृंगवेरपुर प्रयागराज राजा को गुहराज निषाद की राजधानी माना जाता था। यहां से जलमार्गों पर नियंत्रण रखने वाला यह समाज धीरे-धीरे मध्य प्रदेश की ओर बढ़ा, ऐतिहासिक रूप से आर्यों के विस्तार, नए राज्यों के उदय प्राकृतिक संसाधनों जैसे मछली और जल मार्ग की तलाश में यह समाज गंगा की सहायक नदियों से होता हुआ मध्य भारत की ओर बढ़ा शोध करता द्वारा यह माना जाता है कि यह प्रवास एक साथ नहीं बल्कि कई चरण में हुआ।
गोंडवाना काल और मांझी समाज
जबलपुर का इतिहास गोंड राजाओं विशेष कर रानी दुर्गावती से गहराई से जुड़ा हुआ है जलवंशी मांझी समाज का इतिहास काल में विशेष महत्व था गोंड राजाओं के समय नर्मदा नदी एक प्राकृतिक सुरक्षा रेखा थी माझी समाज के लोग अपनी नौकायन कला के कारण नदी की निगरानी और सेना को गुप्त रास्तों से बाहर ले जाने का कार्य करते थे जबलपुर को 52 ताल तलैयो का शहर कहा जाता है इन 52 ताल तलैयो की रखरखाव मदद से पालन और सिंघाड़ा की जिम्मेदारी ऐतिहासिक रूप से जलवंशी मांझी समाज के पास रही है।
निषादवंशी जलवंशी मांझी मछुआ समाज भगवान श्री राम के बाल सखा श्रंगवेरपुर के राजा गुहराज निषाद राज को अपना भगवान मानते हैं और उनकी पूजा आराधना करते हैं भारत में आक्रांताओं के आगमन के कारण देवी देवताओं के मंदिर तोड़े गए भगवान निषाद राज का भी मंदिर तोड़ा गया समाज को दबाने और कुचलना की नीति के कारण एक भी मंदिर मौजूद नहीं था नर्मदा नदी के तट पर एक भी मंदिर भगवान निषादराज का नहीं था भगवान निषादराज का मंदिर पूरी तरह से नर्मदा तटों से विलुप्त हो गया आधुनिक समय में निषादवंशी समाज ने नर्मदा तट पर एक लम्बा संघर्ष कर पुनः ज़मीन प्राप्त की और आज के आधुनिक समय में भगवान को राज निषाद का मंदिर बनवाया गया मंदिर निर्माण कार्य राष्ट्रीय निषाद संघ मध्य प्रदेश द्वारा कराया गया।
ब्रिटिश काल और सामाजिक पहचान-अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान जलवंशी माझी समाज की गणना एक साहसी और स्वाभिमानी समुदाय के रूप में होती थी आजादी के बाद 1950 (क्रमांक 29 पर) में भारत सरकार के संविधान आदेश के तहत जलवंशी माझी समाज के मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति(ST) के रूप में मान्यता दी गई थी ।1980 के दशक के बाद जलवंशी मांझी समाज उपजातियों ढीमर ,केवट ,मल्लाह सिगरहा,भोई आदि के जाति प्रमाण पत्र को लेकर कानूनी संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है जिसमें जबलपुर फैसले दिए गए हैं।
नोट – यह लेख लेखक प्रभात बर्मन ढीमर के लघु शोध और अनुभवों के आधार पर लिखा गया है यदि इसमें जलवंशी निषादवंशी मांझी मछुआ समाज के बुद्धिजीवी मार्गदर्शन कर सुधार कर सकते हैं और पुराने दस्तावेज उपलब्ध कराकर इस लेख को और बेहतर बनाने में लेखक की सहायता कर सकते हैं प्रभात बर्मन एक शोधकर्ता है उन्होंने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से जबलपुर जिले के विशेष संदर्भ में अंगदान पर शोध कार्य किया है। प्रभात बर्मन भारत के जाने माने इतिहासकार डॉ आनंद सिंह राणा के शिष्य हैं। यदि आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं या फिर आप हमें किसी प्रकार का सुझाव देना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhatkikalam@gmail.com पर भेज सकते हैं।
Prabhat umang धीवर समुदाय के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है प्रभात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दैनिक स्वदेश , दैनिक स्वदेश ज्योति और नव स्वदेश समाचार पत्र में सहायक लेखक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं प्रभात उमंग एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने धीवर समुदाय के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है