माझी आरक्षण सामाजिक पृष्ठभूमि संवैधानिक स्थिति और वर्तमान परिदृश्य की एक समीक्षा

प्रस्तावना– भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को सामाजिक न्याय और समानता का अधिकार देता है इसी संवैधानिक भावना के तहत समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में माझी समुदाय के आरक्षण और सामाजिक वर्गीकरण (Classification)का विषय कानूनी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का केंद्र रहा है।
यह लेख किसी राजनीतिक विवाद या भावनात्मक बहस से परे है पूरी तरह से तथ्यात्मक ,ऐतिहासिक दस्तावेजों और कानूनी पहलुओं के आधार पर इस विषय को समझने का एक निष्पक्ष प्रयास है इसका उद्देश्य पाठकों को इस विषय से जुड़े तकनीकी पहलुओं से अवगत कराना है।
ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक पृष्ठभूमि (Historical & Administrative Background)
मध्य प्रदेश में माझी समुदाय की स्थिति को समझने के लिए हमें देश की स्वतंत्रता और राज्यों का प्रशासनिक रिकॉर्ड देखना होगा।
प्राचीन गजट और प्रशासनिक वर्गीकरण
यदि हम आजादी के बाद 1948 पुराने गजट (Official Gazettes) को देखें तो मझवार माझी अनुसूचित जनजाति में घोषित है 1901 में अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में जनगणना हुई थी यह अमल गमेटेड जाति का जनगणना थी।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का साक्ष्य भीमराव अंबेडकर जी से मुलाकात और पत्र क्रमांक 190
माझी आरक्षण के इतिहास की गहराई और इसके शुरुआती संघर्ष को समझने के लिए हमें 1949 के उन ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखना होगा जो आज राष्ट्रीय अभिलेखागार ( National Archives) मैं सुरक्षित हैं यह दस्तावेज दर्शाते हैं कि समाज को संवैधानिक अधिकार दिलाने की राह कितनी चुनौती पूर्ण और तकनीकी उलझन से भरी थी।

शासकीय प्रक्रिया का कड़ा रुख और समाज की निराशा- अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1949 में ऑल इंडिया धीवर महासभा जबलपुर ( All India Dhiwar Mahasabha Jabalpur 1949) के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन कानून मंत्री और संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जी से मुलाकात की थी ताकि समाज की दयनीय स्थिति को देखते हुए आरक्षण की मांग का पत्र उन्हें सीधे सौंपा जा सके।
इस मुलाकात के दौरान बाबा साहब का कड़ा और पूरी तरह से प्रशासनिक रूप अपनाया उन्होंने प्रतिनिधि मंडल से सीधे तौर पर पत्र स्वीकार करने से इनकार कर दिया उनका कहना था कि
” कोई भी मांग पत्र केवल उचित शासकीय प्रणाली Official Administrative Channel) के माध्यम से ही स्वीकार किया जा सकता है यदि कोई प्रांतीय सरकार( State/Province) इसके लिए आधिकारिक सिफारिश करती है तभी इस पर संवैधानिक रूप से विचार करना संभव होगा।”
पत्र क्रमांक 190 और हैदराबाद प्रांत की सिफारिश-
बाबासाहेब द्वारा बताए गए इसी कठिन वैधानिक मार्ग का पालन करते हुए समाज के नेताओं ने प्रांतीय स्तर पर प्रयास शुरू किए इसी प्रक्रिया के तहत इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आया जिसे “पत्र क्रमांक 190” के रूप में जाना जाता है यह तत्कालीन पत्र हैदराबाद प्रांत को संबोधित करते हुए जारी किया गया था।
इस पत्र में बहुत ही स्पष्ट गंभीर और संवेदनशील शब्दों में समाज की वास्तविक स्थिति को स्वीकार किया गया था भारत के सबसे बड़े इतिहासकारों में से एक डॉक्टर आनंद सिंह राणा ने इस पत्र का अध्ययन करते हुए बताया कि पत्र में दर्ज है कि धीवर,मल्लाह,केवट,भोई,कहार,निषाद और माझी (Majhi) समुदाय की सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक व्यापारिक स्थिति बेहद चिंताजनक और कमजोर है समाज को इस गहरे पिछड़ेपन से दूर करने और इन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए मांझी समुदाय को आरक्षण का लाभ दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।
1950 में आठ जिलों की माझी जाति को आरक्षण मिला जिसमें सतना ,रीवा ,छतरपुर टीकमगढ़ ,बिना, शहडोल ,दतिया ,पन्ना, जिले शामिल हैं । मध्य प्रदेश प्रांत और बरार सरकार द्वारा मध्य प्रांत सम्मिलित रियासतों का भूमि अधिकार आदेश और नियम के आदेश संख्या 3662-777-12 नागपुर दिनांक 31 मार्च 1949 की आदिवासी जाति की अनुसूची की जनजातियां घोषित की गई थी। जिसमें 70 नंबर पर मझवार, 71 नंबर पर माझी,51 नंबर पर केवट, और 60 नंबर पर कोली (ढीमर) है ढीमर को कोली के साथ समाहित किया गया है।

सचिन के कमांडो विन्ध प्रदेश रीवा (Secretary To chief commando Vindhya Pradesh Rewa) द्वारा दिनांक 7 जनवरी 1950 को The Joint Secretary Government of India Ministry of Law New Delhi को एक पत्र लिखा था जिसमें निर्धारित थि्ब्स (SCHEDULE ThIBRS) में माझी ( केवट,मल्लाह, भोई,धीवर) 8 वे नंबर पर दर्ज है।
इस पारंपरिक समुदायों का पूरा जीवन और आजीविका मुख्य रुप से नदियों तालाबों और जल संसाधनों पर निर्भर थी मानव सभ्यता के आरंभ से ही यह जाति पृथ्वी पर है जहां-जहां जल है जैसे समुद्र, नदियां ,तालाब, बाबली वहां-वहां तटों पर इस जाति ने निवास किया है पानी और प्रगति से जुड़े इसी जुड़ाव के कारण इन्हें समाज और भूगोल में एक विशिष्ट खास पहचान मिली थी।
मध्य प्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित मध्य प्रदेश राज्य पत्र दिनांक 8 फरवरी 1985 में आदिम जाति हरिजन एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग मध्य प्रदेश द्वारा 12 नंबर पर माझी ( ढीमर,भोई, मल्लाह,केवट ,कश्यप ,निषाद,) को पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मिलित कर दिया गया।
माझी महासम्मेलन जबलपुर 1992
जून 1992 में जबलपुर में एक महासम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने माझी (ढीमर मल्लाह ,भोई, केवट) पिछड़ा वर्ग की सूची से विलोपन की घोषणा की और एक बार फिर पुनः माझी की समाहित जातियों को अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित किया गया लेकिन सुंदरलाल पटवा की सरकार गिर गई और फिर से माझी की समाहित जातियों को पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मिलित कर दिया गया।
इसके बाद 1997 मध्य प्रदेश राजपत्र में अधिसूचना जारी हुआ जिसमें फिर पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कर दिया गया।
नीचे दिए लिंक बर्मन कौन सी जाति में आते हैं ऐतिहासिक जानकारी के अभाव में लिखा गया था
सामाजिक एकता का ऐतिहासिक प्रयास 1949 का जबलपुर महासम्मेलन ( History of all India Dhiwar Mahasabha Jabalpur 1949)
माझी समुदाय और उसकी समाहित विभिन्न जनजातियों के बीच यह एकता कोई आधुनिक राजनीतिक विचार नहीं है बल्कि इसकी जे आजादी के समय से जुड़ी हैं स्वतंत्रता के बाद 5 और 6 जून 1949 को जबलपुर में ऑल इंडिया धीवर महासभा द्वारा एक ऐतिहासिक महासम्मेलन का आयोजन जबलपुर मध्य प्रदेश में किया गया था माना जाता है कि उसे दौर में यह संपूर्ण भारत में इस समाज का एकमात्र सबसे बड़ा संगठन था जिसमें देश के कोने-कोने से समाज के प्रबुद्ध लोक शामिल हुए थे।
इस महासम्मेलन में एक क्रांतिकारी और दूरदर्शी निर्णय लिया गया था समाज के विचारों ने महसूस किया कि धीवर ,मल्लाह भोई,केवट ,कहार ,जलिया ,कश्यप ,बाथम और निषाद जैसी जातियों के बीच जो आपसी ऊच नीच का सामाजिक भेदभाव था उसे मिटाना बेहद जरूरी है।
इस भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करने के लिए सम्मेलन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ कि
यह सभी जातियां आपस में रोटी बेटी का संबंध अर्थात वैवाहिक संबंध स्थापित करेंगी इसमें किसी प्रकार की सामाजिक बड़ा नहीं है।
1949 के इस ऐतिहासिक निर्णय का समाज पर बहुत गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ा इसके बाद से ही इन सभी समाहित जातियों में वैवाहिक संबंध स्थापित होने शुरू हुई जो वर्तमान में व्यापक रूप से देखे जाते हैं यह ऐतिहासिक घटना इस बात का जीवन तो प्रमाण है की सांस्कृतिक सामाजिक और पारंपरिक रूप से यह पूरा माझी समुदाय मूलतः एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं।
धीवर (ढीमर)- इस जाति का मूल कार्य पेयजल की खोज करना, जल से जुड़ी जलीय खेती करना, नदियों के किनारे तरबूज चंडी ककड़ी टमाटर लौकी आदि की खेती करना मछली पालन करना, मछली पकड़ना ,मछली बेचना तालाबों में सिंघाड़े की खेती करना, नदियों और तालाबों में नाव चलाना , जल परिवहन सेवा का कार्य करना था भारत के सबसे बड़े इतिहासकारों में से एक डॉ आनंद सिंह राणा कहते हैं कि धीवर जाति के लोग दूर-दूर से पीने योग्य पानी लेकर आते थे और लोगों की प्यास बुझाने का कार्य करते थे जिस गांव में सूखा पड़ता था वहां धीवर जाति के पेय जल सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
केवट – केवट जाति का मूल कार्य नाव चलना है जली खेती मछली पालन मछली पकड़ना बेचना आदि कार्य करते हैं मटका ऐतिहासिक धार्मिक महत्व है रामायण में प्रभु श्री राम को गंगा पार करने का प्रसंग मशहूर है रामायण को सुप्रीम कोर्ट ने प्रमाणिक दस्तावेज माना है।
रामायण प्रमाणिक दस्तावेज है वादों की सहायता से समझिए-
एम सिद्दीकी बनाम सुरेश दास 2019 -अयोध्या विवाद केस में रामायण को प्रमाणिक दस्तावेज माना है जिसमें रामायण और बाल्मीकि रामायण के श्लोक को सीधे कानून साक्षी के रूप में परखा गया है।
राम जन्मभूमि मालिकाना हक मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट 2010-इस मामले में भी रामायण को सबूत माना गया है सबूत के तौर पर सनी के दौरान बाल्मीकि रामायण के बालकांड और अयोध्या कांड को अदालत के सामने बाकायदा पढ़ा गया था कोर्ट ने इसे एक प्रामाणिक ऐतिहासिक साहित्यिक स्रोत माना है।
डॉ सुब्रमण्यम बनाम भारत संघ- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रामायण के एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्रोत और करोड़ों लोगों की अटूट धार्मिक आस्था का एक प्रामाणिक आधार माना गया।
ऊपर दिए गए इन केसों से स्पष्ट है कि न्यायालय ने रामायण को एक साक्ष्य माना है रामायण में प्रभु श्री राम के मित्र निषाद राज का वर्णन मिलता है साथ ही केवट प्रसंग के बारे में भी बताया गया है जो बेहद लोकप्रिय है मध्य प्रदेश में मांझी समुदाय के लोग गुहराज निषाद राज को भगवान मानते हैं और धार्मिक आस्था के साथ भगवान निषाद की पूजा करते हैं माझी समुदाय के लोग भगवान निषाद को अपना वंशज बताते हैं। इनका गोत्र कश्यप है।
माझी – माझी का कार्य जल परिवहन, और जल से संबंधित कार्यों के लिए प्रसिद्ध है मछली पालन मछली पकड़ना बेचना । फिल्में हमारे समाज का प्रतिबिम्ब है ओ माझी रे गीत जल नाव नदियां किनारा के लिए मशहूर है
कहार – कहार जल से जुड़े कार्य करने के अलावा डोली उठने धोने के लिए प्रसिद्ध है प्राचीन काल में महिला डोली एक आवागमन का साधन हुआ करता था राजा महाराजा की रानियों की डोली एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का कार्य कहार किया करते थे । फिल्में हमारे समाज का आईना है फिल्म जानी दुश्मन का गीत चलो रे डोली उठाओ कहार बेहद मशहूर है।
माझी आरक्षण वर्तमान मांग – वर्तमान में माझी समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है समाज की यह मांग इन दिनों तीव्र है हालांकि लोकसभा में इस विषय को रखा जा चुका है अब देखना यह है कि क्या माझी को आरक्षण मिलेगा आपकी क्या राय है कमेंट करके जरूर बतायें
नोट – यह लेख लेखक ने शोध करके माझी समुदाय से प्राप्त दस्तावेजो के आधार पर लिखा है माझी समुदाय से जुड़ी सभी अपडेट्स पाने के लिए बने रहिए आपके अपने न्यूज पोर्टल प्रभात की कलम पर जहां मिलती है माझी समुदाय से जुड़ी सभी खबरें सबसे तेज। यदि आप हमें किसी प्रकार का सुझाव देना चाहते हैं या फिर आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhatkikalam@gmail.com पर भेज सकते हैं।
Prabhat umang निषादवंश के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है वह एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने निषादवंश के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है