ढीमर धीवर एक स्वतंत्र जाति है माझी की उपजाति नहीं है जानिए क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

हमारे समाज में कई जातियों की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान को लेकर लंबे समय से भ्रम या प्रशासनिक विसंगतियां रही हैं ऐसा ही एक महत्वपूर्ण विषय धीवर/ढीमर (बर्मन) समाज का है अक्सर प्रशासनिक अज्ञानता और कानूनी व्याख्या की कमी के कारण धीवर/ ढीमर समाज को किसी अन्य जाति की उपजाति मान लिया जाता है या माझी समुदाय के साथ समाहित करने का प्रयास किया जाता है।
लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज और देश की सर्वोच्च अदालत ( Supreme Court) के निर्णय पूरी तरह स्पष्ट करते हैं कि धीवर/ ढीमर एक पूर्णता स्वतंत्र जाति है यह किसी भी अन्य जाति की उपजाति नहीं है और यह जाति मांझी जनजाति में भी समाहित नहीं है।
ऑल इंडिया धीवर महासभा जबलपुर 1949 का ऐतिहासिक आधार- ढीमर/ धीवर समाज के स्वतंत्र अस्तित्व की लड़ाई आज की नहीं है देश की आजादी के तुरंत बाद वर्ष 1949 में जबलपुर मध्य प्रदेश में आयोजित ऑल इंडिया धीवर महासभा जबलपुर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित किया था।
1949 के इस महासभा के दस्तावेजों और प्रस्तावों के अनुसार
– धीवर समाज की अपनी अनूठी परंपराएं वैवाहिक रीति रिवाज और ताना-बाना है। यह समाज किसी भी अन्य छोटी बड़ी जाति व्यवस्था का हिस्सा या उपजाति (Sub Caste)नहीं है बल्कि आदिकाल से अपनी स्वतंत्र पहचान रखता है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय और कानूनी स्थिति- जातिगत पहचान और अनुसूचित जनजाति के प्रमाण पत्रों के दुरुपयोग को रोकने के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर बेहद कड़े और स्पष्ट निर्णय दिए हैं ढीमर/ धीवर और मांझी माझी जाति के संदर्भ में कानूनी स्थिति को समझने के लिए निम्नलिखित केस और उनके निर्णय है।
स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद (2001)1SCC4
संवैधानिक पीठ का निर्णय (Constitution Bench Verdict) यह इस विषय का सबसे बड़ा और मार्गदर्शक मुकदमा है जिसे सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने तय किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 342 (Article 342) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया
अदालत का स्पष्ट आदेश था: “न तो राज्य सरकार और न ही अदालतों या न्यायाधिकरणों को अनुच्छेद 342(1) के तहत जारी अधिसूचना में निर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची में जोड़ने या घटाने की शक्ति है।” (न तो राज्य सरकार और न ही कोर्ट राष्ट्रपति की सूची में कोई बदलाव, जोड़-तोड़ संशोधन या कर सकते हैं)।
धीवर/ ढीमर माझी के संबंध में महत्व – इस निर्णय ने यह तय कर दिया कि यदि राष्ट्रपति की सूची में केवल मांझी लिखा है तो कोई भी राज्य सरकार प्रशासनिक आदेश जारी करके दीवार को मांझी का पर्यायवाची या उसकी उपजाति घोषित करके एसटी (ST)का लाभ नहीं दे सकती ऐसा करना असंवैधानिक होगा।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
केस: सर्व माझी आदिवासी कल्याण परिषद बनाम भारत संघ (SLP 3625/2011) | आदेश: 08.10.2015
“असली को अधिकार, फर्जी पर वार!”
फर्जी प्रमाणपत्रों की होगी जांच: माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, माझी नाम का सहारा लेकर लाभ उठाने वाले सभी फर्जी लोगों के दावों की कड़ाई से जांच की जाएगी।
जांच का जिम्मा ‘छानबीन समिति’ को: कौन वास्तव में ‘माझी’ अनुसूचित जनजाति (ST) का है और कौन नहीं, इसका फैसला केवल राज्य की हाई-लेवल स्क्रूटनी कमेटी (Scrutiny Committee) ही करेगी।
दस्तावेज ही असली पहचान: केवल नाम के आधार पर ST का लाभ नहीं मिलेगा। पूर्वजों के रिकॉर्ड, वंशावली और प्रामाणिक सरकारी दस्तावेजों की जांच के बाद ही प्रमाण पत्र वैध माना जाएगा।
पी.डी. माझी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (High Court, Jabalpur):
हाईकोर्ट ने उच्च स्तरीय छानबीन समिति (Scrutiny Committee) के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें पैतृक दस्तावेजों में ‘ढीमर’ पाए जाने पर ‘माझी’ जाति का प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया गया था।
म.प्र. शासन का नीतिगत निर्णय (01 जनवरी 2018 का परिपत्र):
अदालती डिक्री और कानूनी लड़ाइयों के बाद स्वयं सरकार ने लिखित में माना कि ये सभी वर्ग मूलतः ढीमर (OBC) हैं। सरकार ने आदेश जारी किया कि भविष्य में ढीमर या उसकी उपजातियों को माझी (ST) का लाभ या प्रमाण पत्र बिल्कुल नहीं दिया जाएगा।
ऑल इंडिया धीवर महासभा, जबलपुर (1949) का कानूनी व ऐतिहासिक महत्व-
एक विधि छात्र के रूप में, आप इस सम्मेलन को “Customary and Historical Evidence of Independent Identity” (स्वतंत्र पहचान का पारंपरिक और ऐतिहासिक साक्ष्य) के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।
कानूनी प्रासंगिकता: किसी भी जाति के सामाजिक दर्जे को तय करने के लिए अदालतें ऐतिहासिक दस्तावेजों और समाज के अपने स्वतंत्र आंदोलनों को साक्ष्य (Evidence) के रूप में देखती हैं।
1949 का महत्व: वर्ष 1949 में जबलपुर में हुआ यह सम्मेलन इस बात का अकाट्य दस्तावेजी प्रमाण है कि संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) से पहले भी यह समाज अपनी पहचान ‘धीवर/ढीमर’ के रूप में ही स्थापित कर रहा था। यदि यह समाज ‘मांझी’ का हिस्सा होता, तो यह कभी भी अपनी स्वतंत्र ‘धीवर महासभा’ का गठन नहीं करता। यह दस्तावेज़ साबित करता है कि ढीमर समाज की अपनी एक पृथक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना रही है, जो किसी अन्य जाति की ‘उपजाति’ होने के दावे को पूरी तरह खारिज करती है।
ढीमर = OBC (स्वतंत्र जाति): ढीमर समाज संवैधानिक रूप से एक स्वतंत्र वर्ग है, जो अपनी सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान रखता है।
ढीमर /धीवर बर्मन के कार्य – नाव चलाना, मछली पालन,जलीय खेती करना,। ढीमर/ धीवर (बर्मन) जाति का कार्य कभी सुअर पालन नहीं था
मांझी = ST (पृथक जनजाति): माझी एक घोषित अनुसूचित जनजाति है।
माझी के कार्य – नाव चलाना, मछली पालन, सुअर पालन । यह रिसर्च में पता चला है।
वर्तमान में – धीवर ढीमर माझी को एक बताकर भ्रमकता फैलाई जा रही है यदि दोनों समुदाय एक माने गए दोनो के कार्य भी एक माने जाएंगे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भ्रमता को खारिज कर दिया है दोनों अलग-अलग जातियां हैं एक नही है।
क्यो फैलाया गया यह भ्रम – यह वोट बैंक की राजनीति है क्योंकि ढीमर/ धीवर जाति की संख्या सबसे अधिक है और माझी समुदाय की संख्या सबसे कम है यदि दोनों को एक बताएंगे तो माझी की संख्या बढ़ जाएगी।
ढीमर/धीवर की संख्या सबसे अधिक – यदि ढीमर/ धीवर समुदाय स्वतंत्र आरक्षण की मांग करे तो आरक्षण मिल सकता है क्योंकि माझी समुदाय जिन भी पुराने दस्तावेज को दिखा रहा है वह सभी धीवर ढीमर के है। इसलिए यदि स्वतंत्र आरक्षण मांगा जाएं तो आरक्षण मिलने की संभावना सबसे अधिक है।
Prabhat umang धीवर समुदाय के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है प्रभात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दैनिक स्वदेश , दैनिक स्वदेश ज्योति और नव स्वदेश समाचार पत्र में सहायक लेखक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं प्रभात उमंग एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने धीवर समुदाय के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है