बुंदेलखंड शौर्य की गूंज निषाद माझी समाज के भगवानदास रैकवार को पद्मश्री अवार्ड 2026 से सम्मानित किया जाएगा

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बुंदेलखंड शौर्य की गूंज निषाद माझी समाज के भगवानदास रैकवार को पद्मश्री अवार्ड 2026 से सम्मानित किया जाएगा

 

 

 

Bundelkhand Shaurya ki gunj Nishad manjhi Samaj ke Bhagwan Das recvar ko padmshri award 2026 se sammanit Kiya jaega
Bundelkhand Shaurya ki gunj Nishad manjhi Samaj ke Bhagwan Das recvar ko padmshri award 2026 se sammanit Kiya jaega

 

 

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने पद्मश्री अवार्ड की घोषणा की जिसमें मध्य प्रदेश के सागर के जाने-माने अखाड़ा उस्ताद भगवानदास रैकवार का भी नाम शामिल है। भगवानदास रैकवार को यह पद्मश्री सम्मान विलुप्त होती बुंदेली मार्शल आर्ट की कला को मंच पर प्रस्तुत करने और उसका संरक्षण करने के लिए दिया जा रहा है

 

 

बुंदेलखंड की माटी का शौर्य या अब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में एक पद्मश्री से चमकने वाला है भारत देश ही नहीं बल्कि पूरे मध्य प्रदेश और पूरे निषाद माझी समाज के गौरव बुंदेली मार्शल आर्ट के मर्मज्ञ उस्ताद भगवान दास रैकवार को यह सम्मान मिलना हर उसे व्यक्ति के लिए गर्व की बात है जो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति से प्यार करता है। संभवत मध्य प्रदेश के जलवंशीय निषाद मांझी समाज में यह पहला मौका है जब बुंदेली कला और संस्कृति से जुड़े किसी कलाकार को पद्मश्री अवार्ड से नवाजा जा रहा हों ।

 

 

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्मश्री पुरस्कार की सूची में भगवान दास रैकवार का नाम शामिल होने की घोषणा होते ही पूरे बुंदेलखंड में खुशी की लहर दौड़ गई भारत सरकार ने उनका नाम अनसंघ हीरोज श्रेणी में शामिल किया है जो उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने बिना किसी प्रचार के देश और समाज के लिए असाधारण कार्य किए हो ।83 वर्षीय भगवान दास रैकवार बुंदेली कल के प्रमुख संरक्षक माने जाते हैं उन्होंने वर्ष 1970 में इस प्राचीन युद्ध शास्त्री शैली की विधिवत शिक्षा ली तभी से उन्होंने अपना पूरा जीवन इसके संरक्षण और प्रचार में समर्पित कर दिया हालात ऐसे रहे कि इस कला को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक की सुरक्षित नौकरी तक छोड़ दी।

 

 

भगवानदास रैकवार की प्रारंभिक शिक्षा- भगवान दास रैकवार मूल रूप से सागर मध्य प्रदेश के निवासी हैं उनका जन्म सागर के रामपुरा वार्ड में छत्रसाल अखाड़ा के पास हुआ था बचपन से ही उन्होंने इस कला को देखा था तो इसको चलाने वाले गुरु राम चरण रावत उनके कामकाज से प्रभावित हो गए और उन्होंने अपने अखाड़े से भगवान दास रैकवार को जोड़ दिया जहां भगवान दास रैकवार ने लाठी चलाना तलवार चलाना भला चलाना त्रिशूल चलाना सब कुछ सीखा भगवान दास रैकवार ने अपने गुरु के कहने पर एक अलग शाखा शुरू कर दी जिसमें बच्चों को अखाड़ा भी सिखाने लगे थे उन्होंने इस संस्कृति को विदेशों तक पहुंचा है जिसमें सिंगापुर अमेरिका और रसिया आदि देशों के नाम शामिल है भगवानदास रैकवार ने मॉडल हाई स्कूल सागर से मात्र दसवीं तक की ही पढ़ाई की है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि जुनून और समर्पण हो तो डिग्रियां मायने नहीं रखती हैं भगवानदास रैकवार दो भाइयों में बड़े हैं उनका परिवार भी सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है उनके बेटे राजकुमार रैकवार रंग थिएटर ग्रुप से जुड़े हुए हैं और रंग के माध्यम से लोक संस्कृति को आगे बढ़ा रहे हैं।

 

 

भगवान दास रैकवार का थिएटर से जुड़ाव –साल 1982 में प्रसिद्ध आर्टिस्ट बंसीलाल के जरिए थिएटर से भगवानदास रैकवार का जुड़ा हुआ और बाद में थिएटर के कलाकारों को युद्ध शैली का प्रशिक्षण देने लगे जिस रंग परिस्थितियों में पारंपरिक रंग और प्रभाव देखने को मिला बुंदेली युद्ध कला कोई साधारण खेल नहीं है बल्कि शास्त्रीय युद्ध कला है जिसमें तलवार भाला त्रिशूल दल लाठी झेलम जैसी पारंपरिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाता है भगवान दास रैकवार अब तक 55 लड़के और लड़कियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दे रहे हैं इतना ही नहीं अपने अब तक के सफर में उन्होंने लगभग 5000 से भी अधिक बच्चों और युवाओं को इस युद्ध शैली की बारीकियां सीख चुके हैं उनका योगदान सिर्फ शारीरिक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने युवाओं में अनुशासन आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव की भावना को भी विकसित किया है बुंदेलखंड की परंपरा और कल एक समय तक विलुप्त होने की कगार पर थी लेकिन भगवान दास रैकवार जैसे साधकों की वजह से आज यह फिर से पहचान बना रही है पद्मश्री 2026 से सम्मानित होना न केवल भगवान दास रैकवार के लिए व्यक्तिगत उपलब्धि है बल्कि पूरे मध्य प्रदेश बुंदेलखंड और पूरे निषाद समुदाय के लिए यह गर्व की बात है।

 

 

जाने-माने रंग कलाकार बंसी कॉल के संपर्क में आने से भगवान दास रैकवार का जुड़ाव थिएटर से हो गया जहां उन्होंने थिएटर की कलाकारों को बुंदेली मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण दिया उन्होंने कई बड़ी मंचों पर पहुंचकर प्रशिक्षण प्रदान किया है उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध सफाई फिल्म महोत्सव में भी उन्होंने अपनी कला की प्रस्तुति दी है इसके अलावा हैदराबाद ,लखनऊ, नेशनल स्कूल आफ ड्रामा दिल्ली, मुंबई आदि जगहों पर बुंदेली मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण प्रदान किया है।

 

 

बुंदेली मार्शल आर्ट कला का प्रदर्शन हर वर्ष बुंदेलखंड की धरा पर देखने को मिलता है दशहरा के चल समारोह में और गणपति विसर्जन के दौरान बुंदेली मार्शल आर्ट कला और संस्कृति की झलकियां देखने को मिलती है बच्चे प्रशिक्षण प्रकार लेजम कला की प्रस्तुति देते हैं लाठियां कला की प्रस्तुति देते हैं बुंदेलखंड के सभी जिलों में दशहरा पर्व और अनंत चतुर्दशी पर्व पर बहुत ही भव्य समारोह होता है जिनमें सागर, छतरपुर,दमोह, पन्ना टीकमगढ़ खजुराहो आदि जिले शामिल है दिल्ली मार्शल आर्ट कला की प्रस्तुति देने के लिए यहां के युवा अत्यंत उत्साहित रहते हैं।

 

 

भगवानदास रैकवार का संघर्ष-भगवानदास रैकवार बताते हैं कि अपने करियर की शुरुआती दिनों में उन्होंने बहुत सारे छोटे-मोटे काम किए हैं उन्होंने चार्ट की दुकान में 15 रूपए महिने में काम किया है उन्होंने मजदूरी की है सागर यूनिवर्सिटी में खाना ढोया है। यहां तक की बुंदेली युद्ध कला के लिए उन्होंने अपनी सुरक्षित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की नौकरी तक छोड़ दी थी। आज उनके संघर्ष साधना के दम पर उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री अवार्ड 2026 देने की घोषणा कर दी है।

 

 

 

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