धीवर आरक्षण सामाजिक पृष्ठभूमि संवैधानिक स्थिति और वर्तमान परिदृश्य की एक समीक्षा

प्रस्तावना– भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को सामाजिक न्याय और समानता का अधिकार देता है इसी संवैधानिक भावना के तहत समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को मुख्य धारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में धीवर समुदाय के आरक्षण और सामाजिक वर्गीकरण (Classification)का विषय कानूनी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का केंद्र रहा है।
यह लेख किसी राजनीतिक विवाद या भावनात्मक बहस से परे है पूरी तरह से तथ्यात्मक ,ऐतिहासिक दस्तावेजों और कानूनी पहलुओं के आधार पर इस विषय को समझने का एक निष्पक्ष प्रयास है इसका उद्देश्य पाठकों को इस विषय से जुड़े तकनीकी पहलुओं से अवगत कराना है।
ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक पृष्ठभूमि (Historical & Administrative Background)
मध्य प्रदेश में धीवर समुदाय की स्थिति को समझने के लिए हमें देश की स्वतंत्रता और राज्यों का प्रशासनिक रिकॉर्ड देखना होगा।
ऐतिहासिक दस्तावेजों का साक्ष्य भीमराव अंबेडकर जी से मुलाकात और पत्र क्रमांक 190
धीवर आरक्षण के इतिहास की गहराई और इसके शुरुआती संघर्ष को समझने के लिए हमें 1949 के उन ऐतिहासिक दस्तावेजों को देखना होगा जो आज राष्ट्रीय अभिलेखागार ( National Archives) में सुरक्षित हैं यह दस्तावेज दर्शाते हैं कि समाज को संवैधानिक अधिकार दिलाने की राह कितनी चुनौती पूर्ण और तकनीकी उलझन से भरी थी।

शासकीय प्रक्रिया का कड़ा रुख और समाज की निराशा- अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1949 में ऑल इंडिया धीवर महासभा जबलपुर ( All India Dhiwar Mahasabha Jabalpur 1949) के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन कानून मंत्री और संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर जी से मुलाकात की थी ताकि समाज की दयनीय स्थिति को देखते हुए आरक्षण की मांग का पत्र उन्हें सीधे सौंपा जा सके।
इस मुलाकात के दौरान बाबा साहब का कड़ा और पूरी तरह से प्रशासनिक रूप अपनाया उन्होंने प्रतिनिधि मंडल से सीधे तौर पर पत्र स्वीकार करने से इनकार कर दिया उनका कहना था कि
” कोई भी मांग पत्र केवल उचित शासकीय प्रणाली Official Administrative Channel) के माध्यम से ही स्वीकार किया जा सकता है यदि कोई प्रांतीय सरकार( State/Province) इसके लिए आधिकारिक सिफारिश करती है तभी इस पर संवैधानिक रूप से विचार करना संभव होगा।”
पत्र क्रमांक 190 और हैदराबाद प्रांत की सिफारिश-
बाबासाहेब द्वारा बताए गए इसी कठिन वैधानिक मार्ग का पालन करते हुए समाज के नेताओं ने प्रांतीय स्तर पर प्रयास शुरू किए इसी प्रक्रिया के तहत इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आया जिसे “पत्र क्रमांक 190” के रूप में जाना जाता है यह तत्कालीन पत्र हैदराबाद प्रांत को संबोधित करते हुए जारी किया गया था।
इस पत्र में बहुत ही स्पष्ट गंभीर और संवेदनशील शब्दों में समाज की वास्तविक स्थिति को स्वीकार किया गया था भारत के सबसे बड़े इतिहासकारों में से एक डॉक्टर आनंद सिंह राणा ने इस पत्र का अध्ययन करते हुए बताया कि पत्र में दर्ज है कि धीवर(मल्लाह,केवट,भोई,कहार,निषाद) समुदाय की सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक व्यापारिक स्थिति बेहद चिंताजनक और कमजोर है समाज को इस गहरे पिछड़ेपन से दूर करने और इन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए धीवर समुदाय को आरक्षण का लाभ दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।
लेकिन धीवर समुदाय के साथ षड्यंत्र रचा दिया गया और 1950 के पत्र में धीवर को जानबूझकर कर कोष्ठक में लिखकर माझी को आगे लिख दिया गया जबकि राष्ट्रीय अभिलेखागार भारत सरकार से प्राप्त दस्तावेज और हमारे राजस्व रिकॉर्ड इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण धीवर /ढीमर कभी किसी भी उपजाति नहीं है बल्कि एक स्वतंत्र जाति है पिछले 77 सालों से धीवर समाज को गुमराह किया गया। और धीवर समाज का हक माझी समुदाय को दे दिया गया।
माझी जाति को आरक्षण मिला जिसमें सतना ,रीवा ,छतरपुर टीकमगढ़ ,बिना, शहडोल ,दतिया ,पन्ना, जिले शामिल हैं । मध्य प्रदेश प्रांत और बरार सरकार द्वारा मध्य प्रांत सम्मिलित रियासतों का भूमि अधिकार आदेश और नियम के आदेश संख्या 3662-777-12 नागपुर दिनांक 31 मार्च 1949 की आदिवासी जाति की अनुसूची की जनजातियां घोषित की गई थी। जिसमें 70 नंबर पर मझवार, 71 नंबर पर माझी,51 नंबर पर केवट, और 60 नंबर पर दर्ज है माझी को आरक्षण मिला है। धीवर/ ढीमर पहचान को जानबूझकर मिटाया जाता रहा है।

सचिन के कमांडो विन्ध प्रदेश रीवा (Secretary To chief commando Vindhya Pradesh Rewa) द्वारा दिनांक 7 जनवरी 1950 को The Joint Secretary Government of India Ministry of Law New Delhi को एक पत्र लिखा था जिसमें निर्धारित थि्ब्स (SCHEDULE ThIBRS) में माझी ( केवट,मल्लाह, भोई,) 8 वे नंबर पर दर्ज है। लेकिन धीवर समुदाय माझी समाज में नही आते।
1949 का ऐतिहासिक सत्य: धीवर समाज के साथ हुआ संख्या बल और आरक्षण का छल
1. जबलपुर सम्मेलन (1949) और ऑल इंडिया धीवर महासभा का ऐतिहासिक दस्तावेज
वर्ष 1949 में ऑल इंडिया धीवर महासभा, जबलपुर (मध्य प्रदेश) द्वारा जारी पत्र इस बात का पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण है कि उस समय भारत की कुल 35 करोड़ जनसंख्या में से अकेले धीवर समाज की आबादी लगभग 5 करोड़ थी। पूरे देश में मछुआरा समुदायों के बीच धीवर समाज सबसे बड़ा, सुसंगठित और विशाल जनसंख्या बल रखने वाला समुदाय था।
2. तत्कालीन शासन तंत्र और नेताओं की साठ-गाँठ
तत्कालीन समय में माझी समुदाय की जनसांख्यिकी बेहद सीमित थी। इसके बावजूद राजनीतिक स्वार्थों और प्रशासनिक साठ-गाँठ के चलते कम संख्या वाले माझी समाज के नाम पर आरक्षण और संवैधानिक लाभ तय किए गए। धीवर समाज की विशाल पहचान को दबाने के लिए जानबूझकर धीवर शब्द को कोष्ठक (brackets) में लिखा गया और माझी के उप-नाम के रूप में दर्ज करने की प्रशासनिक चालाकी की गई, ताकि धीवर की स्वतंत्र पहचान और दावों को कमजोर किया जा सके।
3. आर्थिक दबाव से बचने का सरकारी षड्यंत्र
5 करोड़ की विशाल आबादी वाले धीवर समाज को यदि उनकी वास्तविक और स्वतंत्र पहचान के आधार पर पूर्ण आरक्षण दिया जाता, तो तत्कालीन सरकार पर बड़ा आर्थिक और प्रशासनिक भार पड़ता। इस आर्थिक दबाव और बजटीय जिम्मेदारी से बचने के लिए तत्कालीन नीति-निर्माताओं ने बहुसंख्यक धीवर समाज को दरकिनार कर दिया और बेहद कम आबादी वाले वर्ग के नाम पर आरक्षण का ढांचा तैयार कर दिया।
4. मूल अस्तित्व और पहचान की बहाली की कानूनी लड़ाई
1949 के दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड और वंशावली स्पष्ट करते हैं कि धीवर समाज की अपनी स्वतंत्र सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है। किसी राजनीतिक व्यवस्था या साठ-गाँठ के तहत धीवर समाज की इस विशाल संख्या और मूल अस्तित्व को मिटाया नहीं जा सकता। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर अपनी पहचान की रक्षा करना और इस प्रशासनिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना धीवर समाज का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।
इस पारंपरिक समुदायों का पूरा जीवन और आजीविका मुख्य रुप से नदियों तालाबों और जल संसाधनों पर निर्भर थी मानव सभ्यता के आरंभ से ही यह जाति पृथ्वी पर है जहां-जहां जल है जैसे समुद्र, नदियां ,तालाब, बाबली वहां-वहां तटों पर इस जाति ने निवास किया है पानी और प्रगति से जुड़े इसी जुड़ाव के कारण इन्हें समाज और भूगोल में एक विशिष्ट खास पहचान मिली थी।
मध्य प्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित मध्य प्रदेश राज्य पत्र दिनांक 8 फरवरी 1985 में आदिम जाति हरिजन एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग मध्य प्रदेश द्वारा 12 नंबर पर माझी ( ढीमर,भोई, मल्लाह,केवट ,कश्यप ,निषाद,) को पिछड़ा वर्ग की सूची में सम्मिलित कर दिया गया। धीवर/ ढीमर को साथ कोष्ठक में दर्ज करने की साज़िश आज भी चली आ रही है। इस कोष्ठक की दम पर जबरदस्ती धीवर को माझी बताने का षड्यंत्र जारी है हालांकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धीवर एक अलग स्वतंत्र जाति है और माझी अलग जाति है
इसके बाद 1997 मध्य प्रदेश राजपत्र में अधिसूचना जारी हुआ जिसमें फिर पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कर दिया गया।
नीचे दिए लिंक बर्मन कौन सी जाति में आते हैं ऐतिहासिक जानकारी के अभाव में लिखा गया था
सामाजिक एकता का ऐतिहासिक प्रयास 1949 का जबलपुर महासम्मेलन ( History of all India Dhiwar Mahasabha Jabalpur 1949)
धीवर समुदाय और उसकी समाहित विभिन्न जनजातियों के बीच यह एकता कोई आधुनिक राजनीतिक विचार नहीं है बल्कि इसकी जे आजादी के समय से जुड़ी हैं स्वतंत्रता के बाद 5 और 6 जून 1949 को जबलपुर में ऑल इंडिया धीवर महासभा द्वारा एक ऐतिहासिक महासम्मेलन का आयोजन जबलपुर मध्य प्रदेश में किया गया था माना जाता है कि उसे दौर में यह संपूर्ण भारत में इस समाज का एकमात्र सबसे बड़ा संगठन था जिसमें देश के कोने-कोने से समाज के प्रबुद्ध लोक शामिल हुए थे।
1949 के इस ऐतिहासिक निर्णय का समाज पर बहुत गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ा इसके बाद से ही इन सभी समाहित जातियों में वैवाहिक संबंध स्थापित होने शुरू हुई जो वर्तमान में व्यापक रूप से देखे जाते हैं यह ऐतिहासिक घटना इस बात का जीवन तो प्रमाण है की सांस्कृतिक सामाजिक और पारंपरिक रूप से यह पूरा माझी समुदाय मूलतः एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं।
धीवर (ढीमर)- इस जाति का मूल कार्य पेयजल की खोज करना, जल से जुड़ी जलीय खेती करना, नदियों के किनारे तरबूज चंडी ककड़ी टमाटर लौकी आदि की खेती करना मछली पालन करना, मछली पकड़ना ,मछली बेचना तालाबों में सिंघाड़े की खेती करना, नदियों और तालाबों में नाव चलाना , जल परिवहन सेवा का कार्य करना था भारत के सबसे बड़े इतिहासकारों में से एक डॉ आनंद सिंह राणा कहते हैं कि धीवर जाति के लोग दूर-दूर से पीने योग्य पानी लेकर आते थे और लोगों की प्यास बुझाने का कार्य करते थे जिस गांव में सूखा पड़ता था वहां धीवर जाति के पेय जल सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
धीवर राम कुमार रैकवार 70 वर्ष बताते हैं सदियों से हमारा कार्य जल से जुड़ा है हम तालाबों और नदियों खेती करना जल का प्रबंध करना ,जल की व्यवस्था करना। यही हमारा मूल कार्य है हम गाय पालन करते हैं लेकिन हमने कभी भी सुअर पालन का कार्य नहीं किया है ।
धीवर बद्री प्रसाद बर्मन 68 वर्ष बताते हैं कि धीवर का गौरवशाली इतिहास ,संस्कृति,सभ्यता अति प्राचीन है रामायण काल से पहले धीवर जाति जल प्रबंधन से जुड़े कार्यों को करती आ रही है महर्षि कालू धीवर की हम पूजा आराधना करते हैं प्राचीन धार्मिक ग्रंथो के अनुसार महर्षि कालू धीवर महर्षि नारद मुनि के गुरु हैं। मेरे किसी भी पूर्वज ने कभी भी सुअर पालन का कार्य नहीं किया है हमारे दस्तावेजों को मिटाने और मनगढ़ंत तरीके से गढ़ने के लिए मिथ्या फैलाई गई है।
शोधकर्ता लेखक प्रभात ढीमर/धीवर का कहना है कि मैंने अपने बुजुर्गो (70 वर्ष से अधिक उम्र के)परिवार रिश्तेदारों और सभी संबंधियों के धीवर के परंपरागत व्यवसाय के बारे में विस्तार से चर्चा जिसमें स्पष्ट रूप से यह बताया गया कि धीवर/ ढीमर का कार्य मछली पालन करना,नाव चलाना, गौ पालन करना, दूध की व्यवसाय करना,प्यासे को पानी पिलाना,पेय जल की व्यवस्था करना धीवर ढीमर समाज का मूल कार्य है।
लेकिन हमने कभी भी सुअर पालन का कार्य नहीं किया है यह कार्य निचली जातियों द्वारा किया जाता रहा है पहले के समय में जातिगत भेदभाव था धीवर/ढीमर के हाथ का पानी बड़े-बड़े ब्राह्मण पिया करते थे धीवर के हाथ से पीने का पानी भरवाना शुद्ध पवित्र माना जाता है। धीवर/ढीमर ने कभी भी सुअर पालन का कार्य नहीं किया है यह मिथ्या फैलाई गई है बल्कि हमारे इतिहास के साथ छेड़छाड़ की जाने की सादिश है
राम चरण धीवर 68 वर्ष बताते हैं कि हम प्राचीन काल से ही धीवर स्वतंत्र जाति है हम सिंघाड़ा की खेती नाव चलाना और मछली पालन का कार्य करते आ रहे हैं धीवर समाज फल सब्जी की खेती भी करता आ रहा जिनमें,तरबूज,चिमडी,ककड़ी, सिंघाड़ा,आदि शामिल हैं। लेकिन हमने कभी भी सुअर पालन का कार्य नहीं किया है। हमारे हाथ का पानी सभी उच्च वर्ग के लोग पिया करते थे यदि ऐसा होता तो यह उच्च वर्ग के लोग हमें अपने आसपास भी नहीं भटकने देते प्राचीन समय में निचली जातियों की स्थिति बहुत ही दैयनीय थी
धीवर आरक्षण वर्तमान मांग – वर्तमान में धीवर समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है समाज की यह मांग इन दिनों तीव्र है हालांकि लोकसभा में इस विषय को रखा जा चुका है अब देखना यह है कि क्या धीवर को आरक्षण मिलेगा आपकी क्या राय है कमेंट करके जरूर बतायें
नोट – यह लेख लेखक ने शोध करके धीवर समुदाय से प्राप्त दस्तावेजो के आधार पर लिखा है धीवर समुदाय से जुड़ी सभी अपडेट्स पाने के लिए बने रहिए आपके अपने न्यूज पोर्टल प्रभात की कलम पर जहां मिलती है धीवर समुदाय से जुड़ी सभी खबरें सबसे तेज। यदि आप हमें किसी प्रकार का सुझाव देना चाहते हैं या फिर आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhatkikalam@gmail.com पर भेज सकते हैं।
Prabhat umang धीवर समुदाय के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है प्रभात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दैनिक स्वदेश , दैनिक स्वदेश ज्योति और नव स्वदेश समाचार पत्र में सहायक लेखक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं प्रभात उमंग एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने धीवर समुदाय के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है