माझी कौन सी जाति में आती है क्या समाहित जनजातियां पिछड़ा वर्ग की सूची से विलोपित होगी

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मध्य प्रदेश में माझी (Majhi) एक अनुसूचित जनजाति (ST) है हालांकि ढीमर ,मल्लाह ,केवट, और भोई इसकी समाहित जनजातियां हैं ।
माझी आरक्षण तथा माझी में समाहित जनजाति धीवर, मल्लाह केवट,भोई,कहार का विषय जिस पर चर्चा तो हो जाती है लेकिन व्यापक रूप से उजागर नहीं हो पाता इस समुदाय की सुनवाई नहीं की जाती है यह एक दैयनीय और संवेदनशील विषय है। माझी समुदाय के इस पहलू को या तों सुना नहीं जाता यदि सुना जाता है तो अमल नहीं किया जाता । आइये इस इस विस्तार से जानते हैं।
ऐतिहासिक गौरव और पहचान- माझी समुदाय का इतिहास अत्यंत प्राचीन है इन्हें निषाद वंश का प्रतिनिधि माना जाता है रामायण काल के केवट राज और महाभारत की सत्यवती ( मत्स्यगंधा) समुदाय इसी की गौरवशाली प्रतीक है मध्य प्रदेश में जीवन दाहिनी नर्मदा और चंबल जैसी नदियों के सभ्यता विकास में इस समाज का अद्वितीय योगदान रहा है।
मध्य प्रदेश में माझी (Majhi) जाति को लेकर सामाजिक और कानूनी स्थिति काफी महत्वपूर्ण और चर्चा का विषय रही है यह मुख्य रूप से जल आश्रित समुदाय है जिनका पारंपरिक पैसा मछली पकड़ना और नाव चलाना रहा है जल की खेती करने के लिए यह समुदाय प्रसिद्ध है मध्य प्रदेश में माझी (Majhi) शब्द का उपयोग व्यापक रूप से उन समुदायों के लिए किया जाता है जो नदी और तालाबों से अपनी जीविका चलाते हैं। जबलपुर 52 ताल तलाईयों का शहर है जो माझी समुदाय का मुख्य राजनीतिक और सामाजिक केंद्र है।
संवैधानिक स्थिति– वर्तमान में मध्य प्रदेश की सूची में माझी अनुसूचित जनजाति (ST) के अंतर्गत आती है।
माझी में समाहित जातियां- माझी के साथ-साथ धीवर (ढीमर) , केवट,कहार ,मल्लाह , भोई कश्यप जैसी जातियां इसी जनजाति की समाहित जनजातीय हैं भारत सरकार के राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त पत्र जो 7 जनवरी 1950 का है इस पत्र में यह उल्लेखित है प्रमाणित है कि मांझी जनजाति में ( ढीमर मल्लाह केवट भोई) समाहित जनजातियां हैं।
कानूनी और प्रशासनिक विवाद- माझी जनजाति जाति को लेकर मध्य प्रदेश में एक लंबा विवाद रहा है इसका मुख्य कारण पर्यायवाची शब्दों का उपयोग है माझी समुदाय के लोगों ने पर्यायवाची अनेक शब्दों का उपयोग किया जैसे ढीमर मल्लाह केवट भोई कहार।
ST का दर्जा – आप विभाजित मध्य प्रदेश के समय से ही माझी जनजाति को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा गया था।
विवाद का केंद्र– धीवर (ढीमर) ,मल्लाह, केवट, भोई माझी जनजाति में समाहित है लेकिन मध्य प्रदेश सरकार इन्हें लग जाति मानकर पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया है अनुमानित रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि मध्य प्रदेश की सरकारों ने आर्थिक बोझ कम करने के उद्देश्य से ढीमर (धीवर) , मल्लाह, केवट भोई को पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कर दिया है जबकि यह जनजातियां मांझी की समाहित जनजातियां हैं।
ऑल इंडिया धीवर महासभा जबलपुर 1949 द्वारा भारत सरकार को लिखे गए पत्र से यह स्पष्ट होता है कि धीवर, जालिया ,मल्लाह केवट ,भोई ,कहार ,निषाद ,माझी जनजाति की समाहित जातियां हैं जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए ऑल इंडिया धीवर महासभा ने यह संकल्प लिया था कि मां जी की समाहित जातियां के बीच रोटी बेटी का संबंध (वैवाहिक संबंध) स्थापित कर एकता के सूत्र में पिरोया जाएगा और ऐसा हुआ भी। लेकिन मध्य प्रदेश सरकार माझी में समाहित जनजाति धीवर, मल्लाह,केवट, भोई को अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दे रही है।
1992 में माझी की समाहित जातियों को आरक्षण दिया गया– साल 1992 में जबलपुर की रानीताल मैदान में माजी समुदाय का महाकुंभ भरा था तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने मांझी में समाहित सभी जनजाति धीवर मल्लाह केवट भोई कहार तो आरक्षण दे दिया था लेकिन 6 माह के बाद पटवा सरकार अचानक गिर गई और मांझी में समाहित जातियां का आरक्षण केंद्र ने पारित नहीं किया बल्कि मध्य प्रदेश का आरक्षण निरस्त कर दिया जिस कारण ढीमर मल्लाह केवट भोई को पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल कर दिया गया।
शासकीय सेवकों को लाभ से वंचित – माझी जनजाति में समाहित जनजाति धीवर (ढीमर), मल्लाह ,भोई ,केवट को वर्ष 1992 में सुंदरलाल पटवा सरकार ने आरक्षण दिया तो समुदाय के लोगों ने माझी जनजाति के जाति प्रमाण पत्र बनवाए लेकिन बाद में निरस्त कर दिया केंद्र सरकार समाहित जातियों को आरक्षण स्वीकार नहीं किया । जिस कारण माझी जनजाति में शामिल सामाजिक जाति के लोगों को शासकीय नौकरी में खतरा उत्पन्न हो गया। जबकि 20 मई 1990 को अखबार में छपी खबर के मुताबिक तत्कालीन केंद्रीय श्रम मंत्री रामविलास पासवान ने कहा था कि एक सौ जातियों को सूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाएगा इस विधेयक को मंजूरी दे दी गई है।

hongi (20 मई 1990 का यह अखबार जिसमें 100 जातियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल होने की बात कही गई थी)
आरक्षण की मांग– माझी में समाहित जनजाति धीवर (ढीमर) , मल्लाह,भोई, केवट,कहार मध्य प्रदेश में वर्षों से पीड़ित हैं माझी में समाहित जनजातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है आज भी शिक्षा से वंचित है बेरोजगार हैं अपने पारंपरिक व्यवसाय से भी वंचित होते जा रहे हैं माझी समुदाय के लोग प्रदेश भर में लगातार ज्ञापन देखकर समाहित जनजातियो को पिछड़ा वर्ग की सूची से विलोपन की मांग करते आ रहे हैं लेकिन इस और मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार ध्यान नहीं दे रही है।
माझी जनजाति की पंजीकृत संस्थाएं – माझी जनजाति और इसमें समाहित जनजातियो धीवर,मल्लाह,भोई,केवट, निषाद,नाम से मध्य प्रदेश में अनेक पंजीकृत संस्थाएं हैं जो लगातार प्रदेश सरकार से माझी में समाहित जनजाति का पिछड़ा वर्ग की सूची से विलोपन की मांग करती आ रही है।
समस्याएं – माझी जनजाति में समाहित जनजातियां धीवर (ढीमर) केवट ,भोई , मल्लाह,जलिया, कश्यप,बाथम, निषाद,पथिवाहक, इन सभी जनजातियों को दस्तावेजी ऐतिहासिक जानकारी होना आवश्यक है ताकि समस्त जनजाति केवल माझी एक नाम का उपयोग करने लगे वर्तमान समय में माझी में समाहित जनजाति के लोग जानकारी के अभाव में और जागरूकता की कमी के कारण विभिन्न नाम का उपयोग कर रहे हैं।
समाधान – धीवर (ढीमर), मल्लाह, माझी केवट,जलिया, कश्यप, बाथम, निषाद,पथिवाहक, कहार,सोधिया, रैकवार इन सभी एक नाम का उपयोग करना चाहिए “माझी” जनजाति। इन समाहित जनजाति के लोगों को अपने जाति प्रमाण पत्र में देखना चाहिए कि उनके जाति प्रमाण पत्र में जाति क्या लिखी है इससे आपकी वास्तविकता का पता चल पाएगा।
नोट – यह लेख माझी समुदाय के वारिष्ठ जागरूक समाजसेवियों से दस्तावेजों और प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा गया है मध्य प्रदेश में माझी जनजाति पर हमारा हमारा शोध कार्य जारी है हम माझी जनजाति से जुड़े सभी प्रकार के दस्तावेज पाने के लिए बने रहिए आपके अपने न्यूज पोर्टल प्रभात की कलम पर। जहां आपको मिलती है माझी समुदाय की समस्त अपडेट सबसे तेज। आप हमें किसी प्रकार का सुझाव देना चाहते हैं या फिर आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhat ki kalam पर भेज सकते हैं।
Prabhat umang निषादवंश के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है वह एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने निषादवंश के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है