माझी कौन सी जाति में आती है क्या समाहित जनजातियां पिछड़ा वर्ग की सूची से विलोपित होगी

माझी कौन सी जाति में आती है क्या समाहित जनजातियां पिछड़ा वर्ग की सूची से विलोपित होगी

 

 

 

Majhi kaun si jati me aati hai kya samahit janjatiyan pichhada varg ki Suchi se vilopit hongi ​
Majhi kaun si jati me aati hai kya samahit janjatiyan pichhada varg ki Suchi se vilopit
hongi

 

 

मध्य प्रदेश में माझी (Majhi) एक अनुसूचित जनजाति (ST) है

 

 

माझी एक अनुसूचित जनजाति है जो मध्य प्रदेश में बहुत कम पाई जाती है

 

 

 

मध्य प्रदेश में माझी (Majhi) जाति को लेकर सामाजिक और कानूनी स्थिति काफी महत्वपूर्ण और चर्चा का विषय रही है ।माझी जनजाति अनुसूचित जनजाति में आती है यह एक स्वतंत्र जन जाति है

 

 

माझी जाति का मूल कार्य नाव चलाना,मछली पकड़ना है माझी जनजाति द्वारा सुअर पालन का कार्य भी किया जाता है।

 

 

जबकि*धीवर* जाति का कार्य मछली पालन करना,नाव चलाना जल का प्रबंधन करना और जलीय खेती करना है।यह जाति पिछड़ा वर्ग में आती है।

 

 

धीवर और माझी का कार्य लगभग एक जैसे हैं इसलिए दोनों जातियों को अक्सर एक बताने का असफल प्रयास किया जाता है। लेकिन धीवर समुदाय के लोग कभी भी एक नहीं मानते।

 

 

धीवर और माझी जाति को एक बताने का प्रयास किया जाता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार धीवर एक स्वतंत्र अलग जाति है और माझी एक अलग जाति है है।

 

 

धीवर ऐतिहासिक गौरव और पहचान- धीवर समुदाय का इतिहास अत्यंत प्राचीन है इस समाज को निषाद जाति के समान माना जाता है रामायण काल के केवट राज और महाभारत की सत्यवती ( मत्स्यगंधा) समुदाय इसी की गौरवशाली प्रतीक है जबकि धीवर समाज का इतिहास निषाद काल से पहले का है दोनों जाति के कार्य समान है मध्य प्रदेश में जीवन दाहिनी नर्मदा और चंबल जैसी नदियों के सभ्यता विकास में इस समाज का अद्वितीय योगदान रहा है।

 

 

लेकिन धीवर ढीमर जाति पर चर्चा का अभाव है जिसका मुख्य कारण भ्रामकता है धीवर/ ढीमर एक पूर्ण स्वतंत्र जाति है धीवर  मुख्य रूप से जल आश्रित समुदाय है जिनका पारंपरिक पैसा मछली पकड़ना और नाव चलाना रहा है जल की खेती करने के लिए यह समुदाय प्रसिद्ध है मध्य प्रदेश में धीवर /ढीमर शब्द का उपयोग व्यापक रूप से उन समुदायों के लिए किया जाता है जो नदी और तालाबों से अपनी जीविका चलाते हैं। जबलपुर 52 ताल तलाईयों का शहर है जो धीवर /ढीमर समुदाय का मुख्य राजनीतिक और सामाजिक केंद्र है।

 

 

 

संवैधानिक स्थिति– वर्तमान में मध्य प्रदेश की सूची में धीवर/ढीमर जाति को  पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आती है।

 

 

 

धीवर में समाहित जातियां- धीवर /ढीमर के साथ-साथ , केवट,कहार ,मल्लाह , भोई कश्यप जैसी जातियां इसी जनजाति की समाहित जनजातीय हैं भारत सरकार के राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त पत्र जो 1949 का है इस पत्र में यह उल्लेखित है प्रमाणित है कि धीवर /ढीमर समुदाय (  मल्लाह केवट भोई जलिया, कहार) समाहित जनजातियां हैं।

 

 

कानूनी और प्रशासनिक विवाद- धीवर जनजाति को लेकर मध्य प्रदेश में एक लंबा विवाद रहा है इसका मुख्य कारण पर्यायवाची शब्दों का उपयोग है माझी समुदाय के लोग धीवर को माझी में समाहित बताने का प्रयास करते हैं लेकिन जो तथ्य दिए जाते हैं वह स्वीकार नहीं किए जाते धीवर के पर्यायवाची अनेक शब्दों का उपयोग किया जैसे ढीमर मल्लाह केवट भोई कहार को माझी मे समाहित बताने का प्रयास किया जाता है लेकिन यह ग़लत है धीवर ढीमर एक स्वतंत्र जाति है।

 

 

ST का दर्जा – आप विभाजित मध्य प्रदेश के समय से ही माझी जनजाति को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा गया था।

 

 

विवाद का केंद्र– धीवर (ढीमर) ,एक स्वतंत्र जाति है वह किसी मे समाहित नहीं है लेकिन भारत में धीवर/ ढीमर समुदाय का एक साल 1949 में एक अपना संगठन था All INDIAN DHIWAR MAHASABHA JABALPUR 1949 जिसमें सबसे पहले आरक्षण की मांग की थीलेकिन अनुमानित  रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि मध्य प्रदेश की सरकारों ने आर्थिक बोझ कम करने के उद्देश्य से ढीमर (धीवर) को कोष्ठक में लिख दिया गया, और उसमें सम्मिलित मल्लाह, केवट भोई को पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल कर दिया है।

 

 

लेकिन माझी को अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित कर लिया है अब कुछ धीवरों/ढीमरो ने माझी जनजाति का सार्टिफिकेट बनवा लिया बाद में इस पर विवाद बन गया अब धीवर/ढीमर को कोर्ट ने माझी नहीं माना। तों सभी धीवर मल्लाह केवट भोई कहार माझी को एक बताया जाने लगा।यह विवाद आज भी जारी है ।

 

 

धीवर ढीमर की वास्तविक पहचान को छिपाकर सबको माझी बताने का सिलसिला शुरू हो गया है माझी नाम से की संगठन बन चुके जों धीवर ढीमर जाति की वास्तविक पहचान को छुपा कर सबको माझी बनाने में लगे हुए हैं जबकि धीवर/ ढीमर अपने आप में एक स्वतंत्र जाति है।

 

मध्य प्रदेश के मछुआ समाज के लगभग अनुमानित 98% राजस्व रिकॉर्ड में धीवर/ढीमर दर्ज है। इसलिए जब राजस्व रिकॉर्ड की जांच होती है तो धीवर/ढीमर दर्ज पाया जाता है जो प्रमाणित कर देता और कि धीवर/ढीमर और माझी अलग अलग जातियां हैं सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी तथ्य को संवैधानिक प्रमाण माना है।

 

 

आज धीवर/ ढीमर समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ तात्कालिक लाभ या राजनीतिक समीकरणों के चलते हमारी मूल पहचान को बदलने का प्रयास हो रहा है। सवाल यह नहीं है कि हमें क्या मिल रहा है, सवाल यह है कि क्या हम अपनी मूल जड़ें खो रहे हैं?” ऐसे में तों धीवर/ढीमर जाति अपनी पहचान खो रही है अपना अस्तित्व खो रही है।

 

 

 

ऑल इंडिया धीवर महासभा जबलपुर 1949 द्वारा भारत सरकार को लिखे गए पत्र से यह स्पष्ट होता है कि धीवर, जालिया ,मल्लाह केवट ,भोई ,कहार ,निषाद , धीवर की समाहित जातियां हैं

 

 

 

1992 में माझी की समाहित जातियों को आरक्षण दिया गया– साल 1992 में जबलपुर की रानीताल मैदान में माजी समुदाय का महाकुंभ भरा था तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने मांझी में समाहित सभी जनजाति धीवर मल्लाह केवट भोई कहार तो आरक्षण दे दिया था यह बताकर कि माझी मे समाहित है धीवर ढीमर मल्लाह केवट भोई कहार । लेकिन किन 6 माह के बाद पटवा सरकार अचानक गिर गई और धीवर/ ढीमर जाति एक बार फिर से स्वतंत्र हो गई  मध्य प्रदेश का आरक्षण निरस्त कर दिया जिस कारण ढीमर मल्लाह केवट भोई को पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल कर दिया गया।

 

माझी और धीवर/ढीमर जाति एक है  लेकिन परम सत्य यही है दोनों अलग-अलग जातियां हैं यह मिथ्या फैलाई गई है इसलिए 1992मे तत्कालीन केन्द्रीय सरकार ने आरक्षण का लाभ धीवर नहीं दिया। यह मिथ्या आज भी जारी है।

 

 

 

शासकीय सेवकों को लाभ से वंचित – माझी जनजाति में समाहित बताकर जिन जाति धीवर (ढीमर), मल्लाह ,भोई ,केवट को वर्ष 1992 में सुंदरलाल पटवा सरकार ने आरक्षण दिया तो समुदाय के लोगों ने माझी जनजाति के जाति प्रमाण पत्र बनवाए लेकिन बाद में निरस्त कर दिया केंद्र सरकार इन जातियों को आरक्षण स्वीकार नहीं किया । जिस कारण माझी जनजाति में शामिल सामाजिक जाति के लोगों को शासकीय नौकरी में खतरा उत्पन्न हो गया। जबकि 20 मई 1990 को अखबार में छपी खबर के मुताबिक तत्कालीन केंद्रीय श्रम मंत्री रामविलास पासवान ने कहा था कि एक सौ जातियों को सूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाएगा इस विधेयक को मंजूरी दे दी गई है।

 

 

 

Majhi kaun si jati me aati hai kya samahit janjatiyan pichhada varg ki Suchi se vilopit hongi
Majhi kaun si jati me aati hai kya samahit janjatiyan pichhada varg ki Suchi se vilopit
hongi (20 मई 1990 का यह अखबार जिसमें 100 जातियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल होने की बात कही गई थी)

 

 

 

आरक्षण की मांग–  माझी समुदाय के लोगों की संख्या मध्य प्रदेश में बहुत कम है इसलिए आरक्षण का लाभ लेने के लिए एक बड़ा एजेंडा बनाकर धीवर (ढीमर) , मल्लाह,भोई, केवट,कहार सबको एक बताने का नारा लगाया जाता रहा है

 

 

 

माझी जनजाति की पंजीकृत संस्थाएं – माझी जनजाति  से मध्य प्रदेश में अनेक पंजीकृत संस्थाएं हैं जो लगातार मध्य प्रदेश में गांव गांव जाकर कम पढ़े लिखे धीवर ग्रामीणों को माझी बताते हैं और  भ्रामकता का शिकार हो जाते हैं

 

 

 

समस्याएं – माझी समुदाय के लोग सभी मछुआरा समाज को एक बताकर आरक्षण का लाभ लेना चाहते हैं जबकि धीवर जाति किसी मे भी समाहित नहीं है धीवर (ढीमर) को दस्तावेजी ऐतिहासिक जानकारी होना आवश्यक है ताकि धीवर की मूल पहचान को बचाया जा सके। धीवर ढीमर जाति के लोग जानकारी के अभाव में और जागरूकता की कमी के कारण स्वयं को माझी जाति का समझने लगे हैं।

 

 

समाधान – धीवर ढीमर, (बर्मन) उपयोग करना चाहिए धीवर जाति के लोगों को अपने जाति प्रमाण पत्र में देखना चाहिए कि उनके जाति प्रमाण पत्र में जाति क्या लिखी है इससे आपकी वास्तविकता का पता चल पाएगा।

 

 

सरकार धीवर/ ढीमर जाति को अनुसूचित जनजाति का आरक्षण देना चाहती है लेकिन माझी समुदाय ने सबको एक बताकर गुमराह कर रखा है। मध्यप्रदेश में धीवर मूल जाति है अब सरकार इतने सारे समुदाय को आरक्षण नहीं दे सकती है।

 

 

 

नोट – यह लेख  धीवर/ढीमर समुदाय के वारिष्ठ जागरूक समाजसेवियों से दस्तावेजों और प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा गया है मध्य प्रदेश में धीवर /ढीमर जाति पर हमारा हमारा शोध कार्य जारी है हम धीवर/ ढीमर जाति से जुड़े सभी प्रकार के दस्तावेज पाने के लिए बने रहिए आपके अपने न्यूज पोर्टल प्रभात की कलम पर। जहां आपको मिलती है धीवर/ ढीमर समुदाय की समस्त अपडेट सबसे तेज। आप हमें किसी प्रकार का सुझाव देना चाहते हैं या फिर आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhat ki kalam पर भेज सकते हैं।

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