चंबल में माझी समाज सदियों से करते हैं निवास माझी मझवार को भी आरक्षण दे सरकार नवल मांझी

Rate this post

चंबल में माझी समाज सदियों से करते हैं निवास माझी मझवार को भी आरक्षण दे सरकार नवल मांझी

 

 

 

Chambal me Majhi Samaj sadiyon Se karte Hain nivas Majhi majwar ko bhi Aarakshan De Sarkar naval Majhi
Chambal me Majhi Samaj sadiyon Se karte Hain nivas Majhi majwar ko bhi Aarakshan De Sarkar naval Majhi

 

 

 

चंबल की उतार लहरों और रेतीले किनारो की दास्तान माझी समाज के जिक्र के बिना अधूरी है सदियों से इस बीहड़ और नदी के भूगोल को अपनी पहचान बनाने वाली चंबल की लहरों के प्रहरी माझी हैं राजस्थान मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को जोड़ने वाली चंबल नदी केवल पानी का बहन नहीं बल्कि एक जीवंत संस्कृति है इस संस्कृति के सबसे पुराने और विश्वसनीय संरक्षक माझी मझवार हैं सदियों से चंबल की गोद में बसे इस मांझी का अस्तित्व नदी की मर्यादा उस प्रभाव से गहराई से जुड़ा हुआ है।

 

 

चंबल में मांझी का निवास कोई हालिया घटना नहीं है बल्कि यह पीडिया का सिलसिला है जब परिवहन के आधुनिक साधन नहीं थे तब चंबल के दुर्गम के नारों के बीच नव ही एकमात्र सहारा थी मां जी ने न केवल लोगों को एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाया बल्कि इस क्षेत्र की भौगोलिक और सामरिक जानकारी सबसे बड़े स्रोत हैं।

 

 

 

Chambal me Majhi Samaj sadiyon Se karte Hain nivas Majhi majwar ko bhi Aarakshan De Sarkar naval Majhi
Chambal me Majhi Samaj sadiyon Se karte Hain nivas Majhi majwar ko bhi Aarakshan De Sarkar naval Majhi

 

 

 

माझी समाज के नवल माझी का कहना है
मध्यप्रदेश में माझी समाज प्राचीन काल से ही निवास करते आ रहा है चंबल नदी के बीहङ किनारे माझी समुदाय मल्लाह केवट के नाम से जाने जाते है एव जंगल पहाङो नदियो के पास आज भी निवास करते है महानगर ग्वालियर शहर गांव मे भी निवास करते है ग्रामीण मे सिंध नदी एव पार्वती नदी के किनारे आज भी झोपङी कच्चा मकान बनाकर रहता है प्राचीन काल से ही जब इस समुदाय की उत्पत्ति हुई मुख्य भोजन मछली पकड़कर खाना रहा है और नाव का परिवहन कर अपनी सेवाएं देना रहा है माझी मझवार समाज को केवट मल्लाह भोई ढीमर बाथम कहार रैकवार नाम से भी जाना जाता है।

 

 

नवल माझी आगे कहते हैं – माझियो का व्यवसाय मूल रूप से मछली पकङना, नाव चलाना जाल बुनना ,खेती करना है प्राचीन समय में माझी समाज जंगलों पर राज किया करते थे और जंगली शिकार भी करके अपने और अपने परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था करते थे कच्ची महुआ और गुङ की मदिरा भी बनाते थे लेकिन आज के आधुनिक समय में केवट मल्लाह भोई ढीमर माझी समाज ने इस कार्य से दूरिया बना ली है। माझी समुदाय का इतिहास जल और जंगल के संरक्षण से जुड़ा हुआ है आज दुनिया आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल है जगंल खत्म हो रहे है नदी मे रेत घाट बनाकर बङे बङे पूजी पतियों ने नादियो का सीना छलनी करके मोटा रूपया कमाना शुरू कर दिया है शासन प्रशासन चुप है जिस कारण माझी केवट मल्लाह भोई ढीमर आदि समाज को बहुत बङा नुकसान लगातार उठा रहा है क्योकि इंसानों की जगह रेत निकालने वाली मशीनो ने ले ली है गरीब मजदूर शोषित माझी समाज के लोग जो खेती बाङी ,ककङी, खरबूजा बटी एवं सिघाङे की खेती नदी किनारे नहीं कर पा रहे हैं रेत निकालने के लिए सरकार ने ठेका प्राइवेट कंपनियों को दे दिया है और यह प्राइवेट कंपनियां मशीनों के माध्यम से रेत निकालती हैं जिस कारण माझी समुदाय वर्ग खेती नहीं कर पा रहा है और नदी के किनारे रहने वाले लोग अपना व्यवसाय छोड़कर पलायन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं और अपना मूल कार्य छोड़ रहे हैं और मजबूरी बस दूसरे व्यवसाय की ओर जाना पड़ रहा है माझी समाज मजदूर का मजदूर बना हुआ है वह तरक्की नहीं कर पा रहा है।

 

 

 

Chambal me Majhi Samaj sadiyon Se karte Hain nivas Majhi majwar ko bhi Aarakshan De Sarkar naval Majhi
Chambal me Majhi Samaj sadiyon Se karte Hain nivas Majhi majwar ko bhi Aarakshan De Sarkar naval Majhi

 

 

 

नवल माझी की आरक्षण की मांग- नवल माझी द्वारा माझी समाज के लिए आरक्षण की मांग केवल एक संवैधानिक मांग नहीं बल्कि वह सदियों से उपेक्षित एक परिश्रमी समाज के अस्तित्व और पहचान की लड़ाई है चंबल से मांझी समाज की प्रमुख मांग अनुसूचित जनजाति में दर्जे में स्पष्ट करने की है नवल मांझी का तर्क रहा है कि मध्य प्रदेश की सूची में “माझी”जाति अनुसूचित जनजाति में दर्ज है लेकिन प्रशासनिक जटिलताओं के कारण माझी समाज को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। वे कहते हैं कि सरकार 1950 के मूल गजट और उसके बाद के संशोधनों के आधार पर माझी समाज को बिना किसी भेदभाव के जाति प्रमाण पत्र जारी करें।

 

 

नवल मांझी का मानना है जब तक समाज को आरक्षण के माध्यम से शैक्षणिक संस्थाओं और राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा तब तक माझी समाज की आवाज दबती रहेगी वे जाति प्रमाण पत्र की प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग करते हैं ताकि समाज का युवा उच्च शिक्षा में आरक्षण का लाभ ले सके नवल माझी की मांग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि नवल माझी की अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचाने वे अक्सर कहते हैं कि माझी समाज को केवल पिछड़ी जाति में रखकर समाज के साथ न्याय नहीं हो रहा क्योंकि उनके जीवन शैली और भौगोलिक चुनौतियां अत्यंत कठिन हैं नवल माझी के लिए आरक्षण की यह मांग समाज के आत्म सम्मान की रक्षा और भविष्य को सुरक्षित रखने का एक जरिया है वे चंबल के बिहारन से लेकर सत्ता के गलियारों तक यह संदेश पहुंचा रहे हैं कि जिस समाज ने सदियों से नदियों की सेवा की है अब समय है कि संविधान उसे उसका हक दे।

 

 

माझी मझवार एकरूपता का तर्क- नवल माझी अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि मांझी ढीमर कश्यप सिंगार बिना मल्ला कर आदि समस्त माझी मझवार की उपजातियां एक ही समुदाय के हिस्से हैं उनका संघर्ष इस बात के लिए है कि शासन प्रशासन माझी समाज को मझवार का एक ही हिस्सा मानकर उन्हें आदिवासी कोट का लाभ दे जैसा कि जबलपुर महाकौशल से शुरू हुए आंदोलन और परशुराम ढीमर जी के समय मांग की जाती रही है। ठीक वैसे ही लंबे समय से नवल माझी चंबल से अपनी मांगो की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।

 

 

नोट – आपको हमारा यह लेख कैसा लगा कमेंट करके जरूर बतायें यदि आपको हमारा यह लेख अच्छा लगा हो तो लाइक शेयर करना ना भूले माझी मझवार ढीमर निषाद समाज से जुड़ी सभी अपडेट्स पाने के लिए बने रहिए आपके अपने न्यूज पोर्टल प्रभात की कलम पर जहां आपको मिलती है मध्यप्रदेश के माझी से जुड़ी सभी अपडेट्स सबसे तेज। यदि आप हमें किसी प्रकार का सुझाव देना चाहते हैं या फिर आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhatkikalam@gmail.com पर भेज सकते हैं।

Leave a Comment

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now