सभी जातियों का पिता कौन है

भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति अत्यंत विशाल और गहन रही है इस सभ्यता के निर्माण में अनेक समुदायों और जातियों का योगदान रहा है इन्हीं में से एक है निषाद जाति जिसे लोक परंपराओं और कुछ सांस्कृतिक मान्यताओं में सब जातियों का पिता कहा जाता है ।

निषाद को सभी जातियों का पिता कहा जाता है क्योंकि मानव सभ्यता का आरंभ जल से हुआ है और निषाद जाति प्राचीन काल से ही जल जंगल और जमीन पर राज करने वाली मानी जाती है। कहते हैं जल के बिना जीवन संभव नहीं है मानव सभ्यता का प्रारंभ जल से हुआ है और निषाद जाति जलवंशी है निषाद जाति को प्राचीन काल से ही जल पर शासन करने वाला माना जाता है निषाद का अर्थ नि: अर्थात जल +षाद अर्थात शासन से लिया गया है । निषाद जाति का उल्लेख रामायण महाभारत और सिंधु घाटी सभ्यता में आर्यों के साथ मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मानव जाति की उत्पत्ति नदियों के किनारे से ही हुई है जहां जल है वह मानव जाति पनपी है वैज्ञानिकों के अनुसार हड़प्पा समुदाय को बसने वाले भी निषाद समुदाय के लोग ही थे इस जाति का इतिहास प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास में बखूबी देखा जा सकता है।
निषाद जाति का उल्लेख हमें प्राचीन ग्रंथो लोक कथाओं और इतिहास में मिलता है यह जाति मुख्य रूप से वन ,नदी, जल और प्रगति से जुड़ी रही है मछली पालन नौका संचालन वन जीवन और प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण निषाद समाज की पहचान रही है माना जाता है कि मानव सभ्यता के प्रारंभिक दौर में जिन लोगों ने प्रकृति के साथ सामंजस बनाकर जीवन जीना सिखाया उनमें निषाद समुदाय का विशेष स्थान था।

लोकमान्यताओं के अनुसार निषाद समाज मानव समाज की प्रारंभिक संरचना का प्रतीक है इसी कारण कुछ परंपराओं में इन्हें सब जातियों का पिता कहा गया है अर्थात वह मूल धाराएं समुदाय जिससे आगे चलकर समाज की अनेक धाराएं विकसित हुई यह कथन किसी जातीय श्रेष्ठ का नहीं है बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक योगदान के सम्मान का प्रतीक है।

पौराणिक वंशावली के अनुसार महर्षि कश्यप सभी जीव जंतुओं और जातियों के पितामह माना जाता है कश्यप ऋषि की विभिन्न पत्नियों से अलग-अलग वंश चले जैसे दीप्ति से दैत्य,अदिति से देव आदि । आज भी जलवंशी निषाद माझी समाज के लोग अपना गौत्र कश्यप बताते हैं निषाद समाज की कई उपजातियां स्वयं को कश्यप ऋषि की संतान मानती हैं।
ऋग्वेद की ऋचाओं के अनुसार- ऋग्वेद की ऋचाओं में कहा गया है चतवारो वर्ण: पचच्मो निषाद: चार वर्ण तो मनुस्मृति के अंतर्गत हैं ब्राह्मण वैश्य क्षत्रिय और शूद्र। लेकिन पांचवा वर्ण निषादों का इसलिए है क्योंकि हम जनजाति वर्ग के लोग हैं और हजारों वर्ष पुरातन काल का जो इतिहास है रामायण उसमें श्रृंगवेरपुर का वर्णन है भगवान श्री राम के बाल सखा को गुहराज निषाद श्रृंगवेरपुर के राजा निषाद को गुह इसलिए कहा जाता था क्योंकि वह गुफाओं में रहते थे वनवास काल के दौरान भगवान श्री राम अपने मित्र निषाद राज से मिले थे और श्रृंगवेरपुर में रात्रि विश्राम किया था रामायण और महाभारत जैसी ग्रंथों में निषादों का उल्लेख मिलता है।
आर्य सभ्यता के विस्तार में जलवंशीय मांझी समाज का योगदान सेतु की तरह रहा है आर्यों के लिए नदियां पूजनीय थी और जलवंशी माझी समाज इन नदियों का ज्ञाता था माझी समाज जल परिवहन का विशेषज्ञ था इतना ही नहीं नदियों के मार्ग और सुरक्षा की जानकारी के विशेषज्ञ भी इस समुदाय के लोग थे आर्य मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन से जुड़े थे जबकि मां की समाज जल संसाधनों मछली पालन और नाव परिवहन का प्रबंधन करता था । दोनों समुदायों ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाई जहां भूमि और जल का संतुलन बना रहे।
ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को सप्त सिंधु कहा गया और जिसका अर्थ है सात नदियों की भूमि । यह सात नदियां आर्यों के जीवन की मुख्य आधार थी सिंधु , व्यास, झेलम, रावी, चेनाब ,सतलज, सरस्वती। सरस्वती सभी नदियों में श्रेष्ठ मानी जाती थी आर्य इस नदी की पूजा करते थे और सबसे पवित्र नदी सरस्वती नदी को मानते थे।
आज से लगभग 4500-5000 वर्ष पहले सिंधु नदी के किनारे लोगों ने रहना शुरू किया हजारों साल पहले नदियों के पास रहना सबसे आसान था क्योंकि वहां पर पीने का पानी और खेती के लिए उपजाऊ जमीन आसानी से मिल जाती थी सिंधु नदी के किनारे रहने वाले लोगों ने सिर्फ झोपड़ियां नहीं बनाई बल्कि पक्के ईंटों के सुव्यवस्थित घर और नियोजित शहर भी बनाएं सिंधु सभ्यता के लोग जल के मास्टर थे उनका पूरा जीवन पानी पर आधारित था मोहनजोदड़ो की खुदाई में एक बहुत बड़ा स्नानागार वैज्ञानिकों को मिला है यह शहर नदियों के किनारे बसा था इसलिए बार-बार नदियों की बाढ़ ने शेरों को तहस-नहस कर दिया खुदाई में मिट्टी की कई परतें मिली हैं जिससे यह पता चला है कि शहर कई बार डूबे और फिर बसाएं गए।
आज आवश्यकता है कि हम ऐसी मान्यताओं को जातीय विभाजन की वजह सामाजिक एकता और सम्मान की दृष्टिकोण से देखें निषाद जाति का इतिहास हमें सिखाता है कि हर समाज और हर समुदाय ने मिलकर भारत की सभ्यता को गढ़ा है। निषाद जाति को सब जाति का पिता कहे जाने की अवधारणा हमें अपने अतीत को समझने प्रकृति से जुड़ने और सामाजिक समरसता को अपनाने की प्रेरणा देती है।
FAQ.
1.निषाद जाति को सभी जातियों का पिता क्यों कहा जाता है
ऐसी मान्यता है कि निषाद जाति को सभी जातियों का पिता कहा जाता है क्योंकि निषाद दुनिया की पहली जाति है जिसने जल, जमीन, और जंगल सभी जगह राज किया है इतिहास इस बात का साक्षी है कि जल से ही मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है और जल के किनारे निषाद जाति सबसे पहले आई और प्राचीन काल से ही निषाद जाति जल जंगल और जमीन पर शासन करती आई है हड़प्पा सभ्यता को बसाने वाले भी निषाद है इसलिए निषाद जाति सभी जातियों का पिता माना जाता है।
2.निषाद जाति के भगवान कौन थे? निषाद जाति के श्रृंगवेरपुर प्रयागराज राजा भगवान गुहराज निषाद है भगवान श्री राम के बाल सखा निषाद राज है हिन्दू धर्म के धार्मिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है।
3.सभी जातियों का पिता निषाद है? सभी जातियों का पिता निषाद को कहा जाता है निषाद दुनिया की पहली जाति है जिसका हर युग में वंदन होता है जब से पृथ्वी हुई मानव सभ्यता हुई तब से ही निषाद जाति है।
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Prabhat umang धीवर समुदाय के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है प्रभात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दैनिक स्वदेश , दैनिक स्वदेश ज्योति और नव स्वदेश समाचार पत्र में सहायक लेखक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं प्रभात उमंग एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने धीवर समुदाय के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है