माझी मझवार आरक्षण की मांग मध्य प्रदेश के महाकौशल प्रांत के जबलपुर से शुरू हुई थी उमाशंकर रैकवार

26 जनवरी 1950 भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है जब हमारा देश पूर्ण रूप से एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना इसी दिन आधिकारिक रूप से भारत का संविधान लागू हुआ था 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन का अंत हुआ।
मध्य प्रदेश के महाकौशल जबलपुर में आजादी के तुरंत बाद ही वंचित समुदायों माझी, मझवार ,ढीमर ने अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संगठित होना शुरू कर दिया था मध्य प्रदेश महाकौशल जबलपुर के परसराम ढीमर ने ढीमर महासभा मध्य प्रदेश का गठन जबलपुर में किया था यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है और मध्य प्रदेश जबलपुर के सामाजिक राजनीतिक इतिहास की एक बड़े हिस्से को उजागर करती है।
1978 में गठित मध्य प्रदेश माजी आदिवासी महासंघ मध्य प्रदेश के तत्कालीन महामंत्री उमाशंकर रैकवार ने प्रभात की कलम को बताया कि आजादी के बाद जब भारत देश अपने स्वरूप में ढल रहा था तब जबलपुर में परसराम ढीमर ने ढीमर महासभा मध्य प्रदेश की नींव रखी थी इस महासभा का मुख्य उद्देश्य माझी ,ढीमर ,मझवार समाज को शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से जागरूक करना था ढीमर महासभा मध्य प्रदेश ने यह प्रस्ताव पारित किया कि ढीमर मांझी और मझवार जातियों की सामाजिक स्थिति आर्थिक स्थिति और उनकी सांस्कृतिक जड़ों को देखते हुए उन्हें अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखे जाने की मांग की थी।
उमाशंकर रैकवार आगे कहते हैं- मां की माजावर दी मर जाती को सभी उपजातियां के केवट मल्लाह कर बॉथंभौर बिना सिंगार कश्यप रैकवार आदि को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर से ढीमर महासभा मध्य प्रदेश के प्रमुख परसराम ढीमर ने मुलाकात की थी परसराम ढीमर जी का बाबा साहेब अम्बेडकर से मिलना एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर उसे समय शोषण और पिछड़े वर्गों को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने के सबसे बड़े पैरोंकार थे।
उमाशंकर रैकवार का कहना है- 1948 के गजट में केवट 51 नंबर पर,ढीमर 60 नंबर पर, मझवार 70 नंबर पर और माझी 71 नंबर पर दर्ज है। 1950 में मध्य प्रदेश के माझी समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर आरक्षण मिला जिसमें मध्य प्रदेश के आठ जिलों को रीवा ,सतना ,छतरपुर ,टीकमगढ़ , शहडोल दतिया पन्ना जिले शामिल हैं लेकिन ढीमर जाति को भारत सरकार ने आरक्षण नहीं दिया। जबकि संविधान में माजी के साथ ढीमर इंक्लूड है जुड़ा हुआ है जिसका अर्थ सेम टू सेम होता है यानी माझी ही ढीमर है जिसमें माझी की सभी उपजातियां शामिल हैं।
माझी जाति के साथ सभी उपजातियां को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग के लिए साल 1978 में माझी समाज के लोगों ने एक महासंघ की स्थापना की जिसका नाम मध्य प्रदेश माझी आदिवासी महासंघ है इस महासंघ का अध्यक्ष जबलपुर से मोतीलाल कश्यप को चुना गया उपाध्यक्ष सोहनलाल सोंधिया महामंत्री सुखलाल बर्मन जबलपुर महामंत्री उमाशंकर रैकवार इंदौर को चुना गया। इस महासंघ का उद्देश्य जितनी भी मांझी मजेदार निषाद जातियों की उपजातियां केवट माला बाथम रैकवार सिंगर आदि समस्त को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए समाज को एकता के सूत्र में बांधने के लिए प्रत्यनशील रही है।
माझी समाज के आरक्षण की समस्याएं उमाशंकर रैकवार इंदौर के अनुसार- 1.माझी मझवार की उपजातियां बहुत सारी हैं लेकिन जितनी भी उपजातियां हैं उन सभी उपजातियां ने स्वयं को जाती घोषित कर रखा है और केवल मध्य प्रदेश में ही नहीं बल्कि देशभर में संगठन बना रखे हैं जिस कारण मांग का स्वर्ण एक समान नहीं हो पाता है ।
2.अशिक्षा-माझी मझवार समुदाय के अधिकतर लोग अशिक्षित हैं उनमें समाज की संवैधानिक जानकारी का अभाव है या कह सकते हैं कि समाज की संवैधानिक जानकारी के प्रति जागरूकता नहीं है यह वर्तमान समय की समस्या है पुराने समय की समस्या यह रही है की दूसरी जाति के लोगों ने माझी समुदाय के लोगों को अनपढ़ होने के कारण सदियों से भ्रमित कर रखा है उनका ब्रेनवाश कर रखा है छुआछूत भेदभाव घृणा के कारण मांझी जाति के लोग डरे से हमें रहे हैं और अपनी परंपरा मानकर इसको प्रथा को मानते चले आ रहे हैं जैसे ऊंची जाति के बुजुर्ग लोगों कि सामने चप्पल पहन कर नहीं जा सकते हैं, माझी जाति का काम केवल झाड़ू पोछा खाना बनाना पानी भरना का ही काम है, पढ़ना लिखना माझी जाति के लोगों का काम नहीं है इस तरह पुरानी प्रथा के कारण हमारे बुजुर्ग दबे और शोषण का शिकार होते आए हैं।
3अशिक्षा के कारण पूंजी पतियों ने हमारी संपत्ति पर कब्जा किया- माझी मझवार ढीमर जाति के लोग अनपढ़ होने के कारण उनकी संपत्ति पर पूंजी पतियों ने धोखे से उनकी संपत्ति पर अपना अधिकार कर लिया उनकी जमीन हड़प लिया करते थे या आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब होने के कारण कम दामों में उनकी जमीनों को खरीद लिया करते थे इतना ही नहीं तालाबों और नदियों के ठेको पर कम दामों में अपने अधीन कर लेते थे। अंग्रेजों के आगमन के समय अंग्रेजों ने शराब की लत भारतीयों को लगा दी और नशे के कारण हमारा समाज कमजोर होता चला गया। आज के आधुनिक युग में भी यह समस्या भारत के कुछ क्षेत्रों में आज भी जारी है।
नोट – यह लेख उमाशंकर रैकवार इंदौर जी से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा गया है यदि आपके पास मजबूत दस्तावेजों के साथ जानकारी है और आप सभी प्रबुद्ध जन और बुद्धिजीवी अपने विचार माझी मझवार ढीमर जाति के विषय में आमजन के सामने प्रगट करना चाहते हैं तो आप हमें ईमेल prabhatkikalam@gmail.com के माध्यम से भेज सकते हैं। माझी मझवार ढीमर समुदाय की जाति उपजातियों से जुड़ी सभी अपडेट्स पाने के लिए बने रहिए आपके अपने न्यूज पोर्टल प्रभात की कलम पर जहां आपको मिलती है माझी समाज की सभी खबरें सबसे तेज।
Prabhat umang धीवर समुदाय के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है प्रभात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दैनिक स्वदेश , दैनिक स्वदेश ज्योति और नव स्वदेश समाचार पत्र में सहायक लेखक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं प्रभात उमंग एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने धीवर समुदाय के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है