जबलपुर के 52 तालाब और ढीमर समाज: जल-विरासत के असली संरक्षक स्वतंत्रता सेनानी छोटेलाल ढीमर

भारतीय इतिहास के अभिलेखागार national archives New Delhi मैं संरक्षित पत्र क्रमांक 190 (दिनांक 6 /12 /1949) एक ऐसा जीवंत प्रमाण है जो मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर को सामाजिक न्याय के आंदोलन के केंद्र के रूप में स्थापित करता है यह पत्र अखिल भारतीय धीवर महासभा के उस ऐतिहासिक दो दिवसीय अधिवेशन (5-6 जून 1949 )की गूंज है जिसने स्वाधीन भारत में सबसे पहले अपने अधिकारों की हुंकार भरी थी।
जबलपुर का इतिहास वाकई में ऐसे कई गुमनाम नायकों और गौरवशाली घटनाओं से भरा हुआ है, जो समाज को एक नई दिशा देते हैं। आपने छोटेलाल ढीमर जी और ढीमर महासभा के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक जानकारी साझा की है। इतिहासकार डॉ. आनंद सिंह राणा के उल्लेख से यह स्पष्ट होता है कि छोटेलाल ढीमर जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था वे केवल एक समाज सुधारक नहीं, बल्कि एक प्रखर राष्ट्रभक्त भी थे।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका छोटे लाल ढीमर का योगदान
दो बार जेल यात्रा: देश की आजादी के लिए उनका समर्पण इतना गहरा था कि उन्होंने ब्रिटिश शासन की प्रताड़ना सहते हुए दो बार जेल जाना स्वीकार किया। उन्होंने न केवल ढीमर (निषाद) समाज को संगठित किया, बल्कि उन्हें मुख्यधारा के स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़कर राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनाया।
शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति श्री जानकी रमण महाविद्यालय की स्थापना जबलपुर में इस महाविद्यालय की स्थापना उनकी दूरदर्शिता का परिणाम है। एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करना यह दर्शाता है कि वे समाज की असली मुक्ति ‘शिक्षा’ में देखते थे।
सांस्कृतिक केंद्र: जैसा कि आपने बताया, यह महाविद्यालय आज भी निषाद समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र (जैसे आदर्श विवाह और परिचय सम्मेलन) के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।
डॉ. अंबेडकर और ढीमर महासभा
जबलपुर में ढीमर महासभा का डॉ. भीमराव अंबेडकर से मिलना और आरक्षण की मांग करना, उस दौर की राजनीतिक जागरूकता को दर्शाता है। यह प्रमाण सिद्ध करता है कि उस समय का नेतृत्व अपने समाज के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग था। इतिहास अक्सर बड़े नामों तक सिमट कर रह जाता है, लेकिन छोटेलाल ढीमर जैसे सेनानी यह याद दिलाते हैं कि आजादी की नींव में समाज के हर वर्ग का पसीना और बलिदान शामिल है। जबलपुर के निषाद समाज के लिए वे निश्चित रूप से एक पथ-प्रदर्शक और गौरव का प्रतीक हैं।
भारतीय इतिहासकार डॉ आनंद सिंह राणा ने बताया कि जबलपुर 52 तालाबों का शहर है जबलपुर का प्राचीन समय में तीन नामो से पहचाना गया सबसे पहला त्रिपुरी,दूसरा जबालिपुरम और तीसरा नाम गढ़ा कटंगा। जबलपुर में नर्मदा नदी होने के साथ साथ जबलपुर 52 तालाबों का शहर है यह एक स्वाभाविक बात भी है और ऐतिहासिक बात भी जहां जल है वहां निषाद ढीमर मल्लाह माझी मछवार केवट का निवास है इसके पक्के प्रमाण भी है जबलपुर में नर्मदा नदी के घाटों के नाम भेड़ाघाट, तिलवारा घाट, जिलहरी घाट, ग्वारीघाट, उमा घाट, खारी घाट, लम्हेटा घाट, सिध्दघाट, दरोगा घाट, सरस्वती घाट, झांसीघाट, गौरैयाघाट, घाट पिंडरई, भिटौली घाट (भटौलीघाट), जमतरा घाट, नन्दिकेश्वर घाट। जबलपुर के तालाब हनुमान ताल ,अधारताल, रानीताल, चेरीताल, फूटाताल, मढाताल, हाथीताल, सूपाताल, देवताल, इमरती तालाब,कोलाताल, बघाताल, ठाकुरताल, गुलौआ ताल, माढोताल, मठाताल, सुआताल, खम्बताल, गोकलपुर तालाब, शाहीतालाब, महानद्दा तालाब, उखरी तालाब, कदम तलैया, भानतलैया, श्रीनाथ की तलैया, तिलकभूमि तलैया, बैनीसिंह की तलैया, तीनतलैया, लोको तलैया, ककरैया तलैया, जूडीतलैया, गंगासागर, संग्रामसागर।
जबलपुर के गांधी भवन से प्राप्त दस्तावेजों और भारत के जाने-माने इतिहासकार डॉ आनंद सिंह राणा ने प्रभात की कलम को बताया कि रतनपुर के कल्चुरी राजा प्रथम जाजल्लदेव के रत्नपुर से प्राप्त शिलालेख के अनुसार कल्चुरी कालीन शिलालेख और मंदिर महाराज जाजल्लदेव प्रथम के समय के शिलालेख न केवल शासन व्यवस्था, बल्कि तत्कालीन धार्मिक निर्माणों की भी पुष्टि करते हैं।
हनुमान ताल और सरोवर: कल्चुरी राजाओं को विशाल तालाबों और सरोवरों के निर्माण के लिए जाना जाता है। हनुमान ताल की प्राचीनता और उसका धार्मिक महत्व इसी कालखंड की वास्तुकला से जुड़ा है।
मठ और मंदिर: तापसमठ और बड़ी खेरमाई जैसे स्थान आज भी जबलपुर की आध्यात्मिक पहचान हैं। खेरमाई को ग्राम देवी के रूप में पूजने की परंपरा सदियों पुरानी है।
2. जल संवर्धन और समाज का संबंध
इतिहास इस बात का गवाह है कि जहाँ-जहाँ जल स्रोत (तालाब, बावड़ी, नदी) विकसित हुए, वहाँ ढीमर, मल्लाह और मांझी समाज की बसाहट रही। यह केवल निवास नहीं था, बल्कि एक पारिस्थितिकी तंत्र था। इन समुदायों ने न केवल जल का उपयोग किया, बल्कि पीढ़ियों तक इन जलाशयों के रक्षक और संरक्षक के रूप में कार्य किया। यह “प्रमाणित बात” सामाजिक इतिहास के उस पहलू को दर्शाती है जहाँ एक समाज विशेष का अस्तित्व सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा था।
3. गढ़ा कटंगा और इमरती तालाब
गढ़ा कटंगा (जबलपुर का प्राचीन केंद्र) गोंडवाना शासन और उससे पहले कल्चुरी प्रभाव का मुख्य क्षेत्र रहा है।
पंडा की मढ़िया और इमरती तालाब: इमरती तालाब के समीप पंडा की मढ़िया और वहाँ की पुजारी परंपरा का ढीमर समाज से होना, इस समुदाय के धार्मिक और सामाजिक प्रभुत्व को सिद्ध करता है। अमृत लाल धीवर (पंडा) जी का संदर्भ यह स्पष्ट करता है कि इन जल संरचनाओं पर समाज का न केवल श्रम का अधिकार था, बल्कि उनका स्वामित्व और प्रबंधन भी उन्हीं के हाथों में था।
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Prabhat umang निषादवंश के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और लेखक हैं उन्हें लेखन का एक लंबा अनुभव है वह एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं उन्होंने निषादवंश के समाज हित में सेवा कार्य किया है समाज कार्य के क्षेत्र का उन्हें एक अच्छा अनुभव है prabhat umang एक शोधकर्ता भी है